गुरुवार, 14 जनवरी 2016

मित्र

मित्र
जन्म से जो साथ आया है, तथा मृत्यु तक जो साथ रहता है, वही तो मित्र है।
मन तो रहता हुआ भी, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ भटकता रहता है, भटकाता है।
इस मन की मित्रता के लिए सभी संत, महात्मा परेशान रहे हैं।
सूरदास जी कह गए,”ऊधो मन नाही दस बीस, जब एक से ही परेशान थे, तब दस
होते क्या होता?
संत कबीर तो गाली तक दे गए , कृष्ण की पूरी गीता इसी कंपायमान चित्त को स्थिर
करने की कला ही है। पर जो सदियों से प्रवचन देते रहे, वही सबसे अधिक अशांत रहे।
बुद्ध, महावीर , नानक , गोरख सभी इसकी मित्रता के लिए उपाय बताते रहे।
राजयोग की पाठशालाएॅं इसी मन की एकाग्रता का पाठ पढ़ा रहीं हैं। पर यह मन है, यह कहीं किसी के
नियंत्रण में आते नहीं देखा।
भगवान रामचंद्रजी जानते हुए भी स्वर्णमृग के शिकार को चल दिए, चलिए वह भी कम था, पर ”वाशरमेन“
के कहने पर इसी मन के आग्रह से उस सीता को भी छोड़ बैठे।
तब से पूरे हिन्दुस्तान में वाशरमेन कल्चर का आधिपत्य है। मीडिया जानता है, यही हमारी गुलामी है, वह
सुबह शाम सबसे पहले हर कचरा विचार को चीख-चीखकर तर्कापित करता रहता है। हम तुरंत निर्णय
कर लेते हैं, बाद में सिर धुनते हेै।ं
एक ही गाना यहॉं लोकप्रिय रहा है, दोस्त दोत ना रहा।
पर जो प्राण है, वह निरन्तर साथ रहता है। साथ छोड़ता ही नहीं , जब छोड़ता है तब शरीर शव
मात्र रह जाता है। मित्र यही प्राण है।
और एक आप हैं, प्राण के भंडार वायुमंडल को प्रदूषित ही किए जारहे हैं।
पर इस मन को जानने पहचानने तथा उसके नियंत्रण के लिए बहुत कहा जाता रहा है।
जो सदा साथ रहता है, मित्र है, ताकतवर मित्र है, उसके बारे में हम उदासीन हैं।
हम कहते हैं, वह अनायास ही आता है, उसका स्वभाव आना-जाना है।
पर उसके साथ हमारी मित्रता कहाँ है?
‘आत्म’ के घर तक जाने का मार्ग यहीं से है। जहाँ मन मंे कल्पना शक्ति है, वही प्राण में पोषण
शक्ति है। निर्मिति मन नहीं करता ,प्राण करता है। आपके स्वास्थ्य की निशानी यही प्राण है।
आप कितने भी उदास हों, क्रोधित हो, प्राण पर ध्यान सधा, आप शांत होत चले जाएंगे।
जहाँ प्राण से मित्रता है, वहीं तो ‘आत्म’ का प्रसाद उपलब्ध है।
वास्तविक मित्र यही प्राण है, स्वच्छता, पर्यावरण बना रहे, आपका पर्यावरण शुद्ध और पवित्र रहे ,यही
आपका स्वभाव हो, यही वास्तविक मित्रता है।

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

ईशावास्योपनिषद -1

ईशावास्योपनिषद  -1

भारतीय चिन्तन यात्रा का यह पहला उपनिषद है। सातवलेकर जी ने इस की भूमिका में कहीं कहा था , यह एक पिता के द्वारा अपने पुत्र को दिया गया उपदेश था, जो अपने विवाह के उपरान्त अपने पिता से मिलने गया था। आज की दुनिया में तथाकथित बाबावाद ने मूढ़ता को ही पैदा कर दिया हेै। सांप्रदायिक उन्मेष ने ग्रंथों की भी व्याख्या अपने आधार पर करके सीधी-सीधी बातों को उलझा दिया हे। गीता-सार के अपने विवेचन में हमने वस्तुवादी दृष्टिकोण को अपनाकर विवेचन किया था। अनेक मित्रों ने उसका स्वागत किया था।तथाकथित बाबावाद और उसके आलोचकों के तिमिर संग्राम में सत्य बहुत दूर छूट गया हें यह उपनिषद जो अत्यंत संक्षिप्त है, सत्य की खोज में अनुपम प्रयास हैं। यहॉं उस पर संक्षिप्त विवेचन प्रतुत किया जा रहा हे।
आधार

यही बात प्रायः सुनने में, देखने मंे, आती है कि यही कही जाता है कि  संसार दुखमय है। जगत के परे कुछ भी नहीं है। उस दिन मित्र मिले थे कह रहे थे कि एक ही रास्ता बचा है, कहीे भग जाऊॅं, मर जाऊॅं, क्या पलायन ही जीवन जीने का एक मात्र मार्ग बचा है?
हमारा  धर्म क्या हमें पलायन ही सौंप रहा है? वेदांत के  तथाकथित भाष्यों के आधार पर पलायनवादियों का गीत ही क्या हमारा जागरण है? भगोड़ों का सन्यास हमारा आदर्श नहीं है। उपनिषद की यह आज्ञा नहीं है।
कुछ लोग कहते हैं कि जगत से अतीत भी कुछ है, वही इस दुख के चक्र से बाहर निकलने का रास्ता है, वे उसे परमतत्व  कहते हैं,वेदांती उसे ब्रह्य कहते हैं। हर दर्शन की अपनी निजि मान्यता है, हम यहॉं खंडन की दृष्टि को मान्यता नहीं दे रहे हैं।

सवाल सामने है,
क्या आत्महत्याही उपाय है?
क्या जीवन का त्याग ही उपाय है?कर्म युक्त जीवनसे पलायन ही, त्याग ही मार्ग है?
उपनिषद कहते हैं, जीवन में रहते हुए त्याग, वर्त्तमान में जीना ही है। यही मार्ग है।
आपके लिए जरूरत है, आपका मस्तिष्क विकसित हो, हृदय खुला हआ हो।
वेदांत एक जीवन दृष्टि है, जगत को ही ब्रह्य स्वरूप देखो,
सियाराम मय सब जग जानी, गोस्वामीजी की उक्ति वेदांत की ही व्याख्या है।
जगत की प्रतिभासित सत्ता है, उसकी व्यवहारिक सत्ता है, उसकी परमार्थिक सत्ता है, उसके वास्तविक रूप को पहचानना ही जीवन शैली है। यही आध्यात्मिक रास्ता है।
यात्रा पर हम आगे बढ़ते हैं-
ॅं
 ॅंएक शब्द ही नहीं है। यह मूल ध्वनि है, जो निरन्तर व्याप्त है।यही प्रणव है। यही ब्रह्मनाद है।
ॅं रूपी चेतना के चार पांव हैं।जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय।
तीन अवस्थाओं का हमें अनुभव है, चौथी उसके पार है। जहॉं वाक् , बैखरी से, मध्यमा में, मध्यमा से पश्यंति में तथा फिर यह अपरा परा में ढल जाती है, वह तुरिया है। यही निर्विचारता की उपसंपदा है। यही वर्त्तमान में रहने की कला है। तेजस से वाक का जन्म होता है वाक् का विचार से गहरा संबंध हैं जब हम ,मौन में होते हैं, स्वाभाविक रूप से हम निर्विचार अवस्था में चले जाते हैं।।

संसार की एक ही समस्या है प्रेम,
कभी कवि जायसी ने कहा था, मनुष्य प्रेम पाकर वैकुंठ को पालेता है, नहीं तो यह देह मुट्ठी भर राख के अलावा कुछ नहीं है।

 जब तक जीवन में प्रेम नहीं मिलता, तब तक  गहरा असंतोष,  मनुष्यों में  , पौधों में पशुआ में ,जीव धारियों में तलाशा जाता है।प्रेम सागर की तरह है, अहर्निश एक सा हे।- अगर घटता है, बढ़ता है प्रेम नहीं है।जो निरन्तर आनंद में हैं,यह उनकी अन्य के प्रति सहज अभिव्यक्ति है। जो पाया जाता है, वह यही आनंद है, जो दूसरों को अनुभव होता है, वह प्रेम है। यही धरती पर गुरूत्वाकर्षण है। यही मनुष्य की शक्ति हैं
 प्रेम सागर की तरह है,- गीता का श्लोक है, ”सारा जल मेरा ही है, मुझमें आकर मिल गया है।“
सभी प्राणियों में , परिस्थितियों मंे ईशा  विद्यमान है,  ईशा से ही ईश्वर शब्द का विकास हुआ है। फिर यह शब्द कालांतर में उस विराट का द्योतकबन गया। जो सबका मूलाधार है।

इसी आधार पर पहला नियम हें कोई और नहीं , कोई गैर नहीं। जब सबमें वही व्याप्त है, तब सभी के प्रति प्रेम , घृणा नहीं, यही नियम है, जो हम बाहर फैंकेगे, वही लौटकर हमारे ही पास आएगा।

दूसरा महत्वपूर्ण नियम है, हमारी विकास की गति वर्तुल है, सीधी रेखा में नहीं है।, एक निश्चित आधार पाने के बाद पतन अवश्यंभावी है। यह नियम , व्यक्ति ,परिवार समाज सभी पर लागू है। आज हम जिस विकास की चर्चा कर रहे हैं,यह प्रकृति के निर्देशों की अवहेलना है। जो सबका है, उसे हम अपने लिए लूट रहे हैं, हम कितना अपने लिए उपयोग कर पाएॅंगे? इतिहास न जाने कितनी सभ्यताएॅं आईं, अंधकार में  र्गइंं।

उपनिषद् का वचन है-”ओम- वह पूर्ण है, और यह भी पूर्ण है,क्योंकि पूर्ण से पूर्ण निकलता है,पूर्ण से पूर्ण लिया है तो भी पूर्ण ही अवशेष रहता है।



 क्रमशः नरेन्द्र नाथ