घर वापसी 1
मित्रों के प्रश्न आए हैं, वे अध्यात्म का व्यवहारिक रूप जानना चाहते हैं, क्या किया जाए, यह लेखमाला उन्हीं सवालों से जुड़ी हुइ्र है। आपकी टिपपणी की प्रतीक्षा रहेगी।
वास्तविक संपत्ति वही है, जो बांटने से बढ़ती है, प्रेम-प्रेम को जगाता है, घृणा-घृणा को जगाती है, हम जो देते हैं, वही, यहीं वापिस लौट आता है।
- हृदय ही सुनता है, मस्तिष्क ने आजतक कुछ सुना नहीं है मात्र समझा है।वहॉं सिर्फ प्रतिक्रिया ही रहती है।
- जब शब्द हृदय में आते हैं, वे सार्थक हो जाते हैं। जब चित्त की शांति से सुना जाता है तब वह भी जो अनकहा रह गया है, दूसरे तक पहुंच जाता है। सुनने वाले के लिए उसके चित्त का मौन- उसे सजगता में रहना उचित है।
- आपके भीतर कोलाहल है, रेल का डिब्बा खचाखच भरा है, वहां किसी बाहर के मुसाफिर के लिए कोई जगह नहीं है।-बिना विचारणा के, अवधारणा रहित देखना, और सुनना शांत जीवन की आवश्यकता है।
मुझे अपने गुरु का का आप्त वचन याद है -
‘वर्तमान में रहो।
- वर्तमान ही आपके साथ है, आपके पास है, जो गया है, वह लौटकर आने वाला नहीं है,उसको उसी अनुरूप आना था, वह आगया, अब जिसे जैसा आना है, वह आएगा, यही होनी है। नियति हैं भागना नहीं , सामना करना हे। जो आने वाला है, वह अनिश्चित है। बहना निरर्थक है।
सही है, क्षण जो है, वही सार्थक हें सार्थक क्षणो का योग ही समय है। जो वर्तमान है। उसे आना ही है। तेजी से बढ़ रहा है, आप उसके साथ रहें, हथेली पर रखे सरसों के दाने की तरह, उन्हें डोलते हुए देखें, उस डोलन के साथ रहे।, ... भीतर कोई विचार नहीं रहे, भीतर का अवलोककर्ता मात्र साक्षी रहे, अपनी ओर से कोई अवधारणा, विचारणा नहीं,। यही सम्यक दर्शन या सम्यक श्रवण कहा जाता है। यही वर्तमान में रहने की कला है। यहॉं , बिना सोचते हुए क्रिया के साथ रहना है।
2. अपने चित्त को विश्रांति दें, बहुत बोझा पहले लाद रखा है, यहां आप आए हैं, बोझा उतारे, जब जाऐंगे, वहां आपका एटीम कार्ड भी साथ नहीं जाएगा, पर यहां इतना बोझा है, होलडोल बंधा रखा है।
बाहर की संपत्ति का बोझा, शरीर के बाहर रहता है। कुली भी मिल जाता है। पर भीतर का बोझा हटाए नहीं हटता, वहां हजारों वट-वृक्ष बन जाएं। इतने बीज रखे रहते हैं। वे ही तो आपके संस्कार हैं।इसे ही चित्त कहा गया है। जो अत्यधिक गत्यात्मक है।यही अंतः करण है।यह वह मनोवैज्ञानिक करण है, जहॉं सारे अनुभवों के प्रवाह अंकित रहते हैं।
- वर्तमान में रहने से, यह जो बोझा है, वह अपने आप हटने लगता है। कोशिश करो, प्रयोग करो, यह कोई कोई अप्राप्य नहीं है। जब बीज को अंकुरित रखने की क्षमता कम हो जाती है, तब एक पूरी फसल पैदा होकर कटने से बच पाती है।
- जो पुराना बोझा है, वह हटे,
तथा नया भार न लदे,
इसके लिए मात्र एक ही उपाय है, आप वर्तमान में रहने का प्रयास करें।
-यहां आप आए हैं, स्वागत है।
वह जो कल गुजरा है, उसे छोड़ दें, छूट जाने दें, बाहर की दुनिया आपके-े हमारे चाहने से बदलने वाली नहीं है।
- न कोई अखबार
‘ न कोई मोबाइल
‘ न कोई सूचना, न न्यूज चैनल
बसएक रात के लिए शांत सो जाएं, ताकि कल की सुबह नई आए, जहां भीतर का कोई दबाव नहीं हो।
- सुन भी लिया है, सूचना आई है, वह न लंे, उस पर चिंतन न करें चिंतन के रस में हर बीज एक वृक्ष बन जाता है।
- बस सतर्क रहना है, आदत पुरानी है। उठते, बैठते, विचारों का समूह मन के दरवाजे पर दस्तक देगा। वह अपने साथ बुलाने आया है। वहां पर शांत रहना है। सतर्क, भटकना नहीं। पूरा दिन तकलीफ में कटेगा, पुरानी आदत छूटती नहीं, पर भटकना नहीं है,यहीे, ध्यान रहे।
- यही ध्यान है,
हर प्रकार की विचारणा, अवधारणा तथा स्मृतियों के सहयोग से यहां बचना है।
- जो है, जो हो रहा हैै, उसके साथ रहना है।
- आप नहाने जाते हैं, नहाए, पर सोचंे नहीं।
- आप ब्रुश कर रहे हैं, करे,ं पर सोचंे नहीं।
हर छोटे से छोटे से कृत्य को यहां ध्यान में बदलने आए हैं।
हम घंटे भर आपको ध्यान सिखाएं, फिर आपकी पुरानी आदत यथावत, कोई लाभ नहीं।
यहां ध्यान जीवन की शैली है, जो आपके साथ हमेशा रहती है। हम जगत और जीवन को नकारकर, हटाकर आपको ध्यान नहीं सिखा रहे हैं।
-दूसरी बात
यहां आपको सहजता से जीना है। सामान्य ही प्रकृति का प्रवेश द्वार है।जो विशेष होते हैं, उन्हें प्रकृति की मोटी मार झेलनी पड़ती है।
साधना में आप अधिकारी नहीं है, न ही विशेंष ज्ञानी हैं। अधिकारिता छूट जानी है। छूटनी है। अधिकारिता को छोड़ना ही साधना का धर्म है।
दिगम्बरत्व वस्त्र खोलना ही नहीं है।वरन अपने भीतर जो अहंकार के बस्त्र ओढ़ रखे हैं, उन्हें उघाड़तेे जाना है। अहंकार कोई वस्तु नहीं है, आप जिसे खरीद लाएॅं, बाहर कर आएॅं।
आप जैसे हैं, जो हैं, वही रूप सामने आना है।
देखिए- परिवर्तन, उसी वस्तु में होता है, जो मूल रूप में रहती है। धातु के साथ जब रसायनिक क्रिया करते हैं, तब बाहर का आवरण हटा देते हैं। तब वह वस्तु रसायनिक क्रिया कर पाती है।
आप यहां मात्र साधक है। न अति विशिष्ट, न विशिष्ट मात्र साधारण, सामान्य साधक।
सहजो बाई ने कहा है
बड़ा न जाने पाहिए, साहिब के दरबार।
एक और बात-
आपकी हमेशा भीड़ में रहने की आदत हो गई है। अकेले में आप रह नहीं पाते। नींद में भी सपनों के साथ रहते हैं। मोबाइल के बिना चैन नहीं है।
अब कोशिश करें, भीतर की भीड़ कम होती चली जाए। बाहर तो भीड़ रहेगी, वह कम करना आपके बस का नहीं है। पर भीतर भीड़ चिंतन से जमा होती है। इस भीड़ को कम करने का प्रयास करें, जमा न होने दे।
जितने विचार कम होते चले जाते हैं। उतनी ही भीड़ कम होती चली जाती है।
यह जमा न हो पाए, यह ध्यान रखें।
- अचानक तो आप योगी नहीं हो सकते-पर यह बात प्रारंभ की भूमिका है।
जब ध्यान में उतरंे, बाहर की दुनिया को बाहर ही छोडं़े। वरना ध्यान में परिवार चला आता है।,संसार चला आता है।
सोचें, आपके कितने जन्म हुए, कहां गए वे परिवार, याद भी नहीं है। याद आ भी जाए तो कोई पहचानने वाला नहीं है।
यह बोध भीतर तक रहे-
आप अकेले हैं, आपको अकेले ही यात्रा करनी है।
महाभारत में युधिष्टर के साथ कुत्ता चला गया था, पर यहां आपको अकेले ही अपनी जीवन यात्रा पार करनी है।
वर्तमान में रहना ही ध्यान है। ध्यान एक प्रकार के उस मानस का प्रारंभिक चरण रहता है। यहां आप अपने मन के साथ जुड़ते हैं।
अपना साक्षात्कार करते हैं, अपनी पहचान पाते हैं।
अपनी पहचान पाना ही मौलिक रुपांतरण ही पहली पहचान है।
क्रमशः नरेन्द्र नाथ
मित्रों के प्रश्न आए हैं, वे अध्यात्म का व्यवहारिक रूप जानना चाहते हैं, क्या किया जाए, यह लेखमाला उन्हीं सवालों से जुड़ी हुइ्र है। आपकी टिपपणी की प्रतीक्षा रहेगी।
वास्तविक संपत्ति वही है, जो बांटने से बढ़ती है, प्रेम-प्रेम को जगाता है, घृणा-घृणा को जगाती है, हम जो देते हैं, वही, यहीं वापिस लौट आता है।
- हृदय ही सुनता है, मस्तिष्क ने आजतक कुछ सुना नहीं है मात्र समझा है।वहॉं सिर्फ प्रतिक्रिया ही रहती है।
- जब शब्द हृदय में आते हैं, वे सार्थक हो जाते हैं। जब चित्त की शांति से सुना जाता है तब वह भी जो अनकहा रह गया है, दूसरे तक पहुंच जाता है। सुनने वाले के लिए उसके चित्त का मौन- उसे सजगता में रहना उचित है।
- आपके भीतर कोलाहल है, रेल का डिब्बा खचाखच भरा है, वहां किसी बाहर के मुसाफिर के लिए कोई जगह नहीं है।-बिना विचारणा के, अवधारणा रहित देखना, और सुनना शांत जीवन की आवश्यकता है।
मुझे अपने गुरु का का आप्त वचन याद है -
‘वर्तमान में रहो।
- वर्तमान ही आपके साथ है, आपके पास है, जो गया है, वह लौटकर आने वाला नहीं है,उसको उसी अनुरूप आना था, वह आगया, अब जिसे जैसा आना है, वह आएगा, यही होनी है। नियति हैं भागना नहीं , सामना करना हे। जो आने वाला है, वह अनिश्चित है। बहना निरर्थक है।
सही है, क्षण जो है, वही सार्थक हें सार्थक क्षणो का योग ही समय है। जो वर्तमान है। उसे आना ही है। तेजी से बढ़ रहा है, आप उसके साथ रहें, हथेली पर रखे सरसों के दाने की तरह, उन्हें डोलते हुए देखें, उस डोलन के साथ रहे।, ... भीतर कोई विचार नहीं रहे, भीतर का अवलोककर्ता मात्र साक्षी रहे, अपनी ओर से कोई अवधारणा, विचारणा नहीं,। यही सम्यक दर्शन या सम्यक श्रवण कहा जाता है। यही वर्तमान में रहने की कला है। यहॉं , बिना सोचते हुए क्रिया के साथ रहना है।
2. अपने चित्त को विश्रांति दें, बहुत बोझा पहले लाद रखा है, यहां आप आए हैं, बोझा उतारे, जब जाऐंगे, वहां आपका एटीम कार्ड भी साथ नहीं जाएगा, पर यहां इतना बोझा है, होलडोल बंधा रखा है।
बाहर की संपत्ति का बोझा, शरीर के बाहर रहता है। कुली भी मिल जाता है। पर भीतर का बोझा हटाए नहीं हटता, वहां हजारों वट-वृक्ष बन जाएं। इतने बीज रखे रहते हैं। वे ही तो आपके संस्कार हैं।इसे ही चित्त कहा गया है। जो अत्यधिक गत्यात्मक है।यही अंतः करण है।यह वह मनोवैज्ञानिक करण है, जहॉं सारे अनुभवों के प्रवाह अंकित रहते हैं।
- वर्तमान में रहने से, यह जो बोझा है, वह अपने आप हटने लगता है। कोशिश करो, प्रयोग करो, यह कोई कोई अप्राप्य नहीं है। जब बीज को अंकुरित रखने की क्षमता कम हो जाती है, तब एक पूरी फसल पैदा होकर कटने से बच पाती है।
- जो पुराना बोझा है, वह हटे,
तथा नया भार न लदे,
इसके लिए मात्र एक ही उपाय है, आप वर्तमान में रहने का प्रयास करें।
-यहां आप आए हैं, स्वागत है।
वह जो कल गुजरा है, उसे छोड़ दें, छूट जाने दें, बाहर की दुनिया आपके-े हमारे चाहने से बदलने वाली नहीं है।
- न कोई अखबार
‘ न कोई मोबाइल
‘ न कोई सूचना, न न्यूज चैनल
बसएक रात के लिए शांत सो जाएं, ताकि कल की सुबह नई आए, जहां भीतर का कोई दबाव नहीं हो।
- सुन भी लिया है, सूचना आई है, वह न लंे, उस पर चिंतन न करें चिंतन के रस में हर बीज एक वृक्ष बन जाता है।
- बस सतर्क रहना है, आदत पुरानी है। उठते, बैठते, विचारों का समूह मन के दरवाजे पर दस्तक देगा। वह अपने साथ बुलाने आया है। वहां पर शांत रहना है। सतर्क, भटकना नहीं। पूरा दिन तकलीफ में कटेगा, पुरानी आदत छूटती नहीं, पर भटकना नहीं है,यहीे, ध्यान रहे।
- यही ध्यान है,
हर प्रकार की विचारणा, अवधारणा तथा स्मृतियों के सहयोग से यहां बचना है।
- जो है, जो हो रहा हैै, उसके साथ रहना है।
- आप नहाने जाते हैं, नहाए, पर सोचंे नहीं।
- आप ब्रुश कर रहे हैं, करे,ं पर सोचंे नहीं।
हर छोटे से छोटे से कृत्य को यहां ध्यान में बदलने आए हैं।
हम घंटे भर आपको ध्यान सिखाएं, फिर आपकी पुरानी आदत यथावत, कोई लाभ नहीं।
यहां ध्यान जीवन की शैली है, जो आपके साथ हमेशा रहती है। हम जगत और जीवन को नकारकर, हटाकर आपको ध्यान नहीं सिखा रहे हैं।
-दूसरी बात
यहां आपको सहजता से जीना है। सामान्य ही प्रकृति का प्रवेश द्वार है।जो विशेष होते हैं, उन्हें प्रकृति की मोटी मार झेलनी पड़ती है।
साधना में आप अधिकारी नहीं है, न ही विशेंष ज्ञानी हैं। अधिकारिता छूट जानी है। छूटनी है। अधिकारिता को छोड़ना ही साधना का धर्म है।
दिगम्बरत्व वस्त्र खोलना ही नहीं है।वरन अपने भीतर जो अहंकार के बस्त्र ओढ़ रखे हैं, उन्हें उघाड़तेे जाना है। अहंकार कोई वस्तु नहीं है, आप जिसे खरीद लाएॅं, बाहर कर आएॅं।
आप जैसे हैं, जो हैं, वही रूप सामने आना है।
देखिए- परिवर्तन, उसी वस्तु में होता है, जो मूल रूप में रहती है। धातु के साथ जब रसायनिक क्रिया करते हैं, तब बाहर का आवरण हटा देते हैं। तब वह वस्तु रसायनिक क्रिया कर पाती है।
आप यहां मात्र साधक है। न अति विशिष्ट, न विशिष्ट मात्र साधारण, सामान्य साधक।
सहजो बाई ने कहा है
बड़ा न जाने पाहिए, साहिब के दरबार।
एक और बात-
आपकी हमेशा भीड़ में रहने की आदत हो गई है। अकेले में आप रह नहीं पाते। नींद में भी सपनों के साथ रहते हैं। मोबाइल के बिना चैन नहीं है।
अब कोशिश करें, भीतर की भीड़ कम होती चली जाए। बाहर तो भीड़ रहेगी, वह कम करना आपके बस का नहीं है। पर भीतर भीड़ चिंतन से जमा होती है। इस भीड़ को कम करने का प्रयास करें, जमा न होने दे।
जितने विचार कम होते चले जाते हैं। उतनी ही भीड़ कम होती चली जाती है।
यह जमा न हो पाए, यह ध्यान रखें।
- अचानक तो आप योगी नहीं हो सकते-पर यह बात प्रारंभ की भूमिका है।
जब ध्यान में उतरंे, बाहर की दुनिया को बाहर ही छोडं़े। वरना ध्यान में परिवार चला आता है।,संसार चला आता है।
सोचें, आपके कितने जन्म हुए, कहां गए वे परिवार, याद भी नहीं है। याद आ भी जाए तो कोई पहचानने वाला नहीं है।
यह बोध भीतर तक रहे-
आप अकेले हैं, आपको अकेले ही यात्रा करनी है।
महाभारत में युधिष्टर के साथ कुत्ता चला गया था, पर यहां आपको अकेले ही अपनी जीवन यात्रा पार करनी है।
वर्तमान में रहना ही ध्यान है। ध्यान एक प्रकार के उस मानस का प्रारंभिक चरण रहता है। यहां आप अपने मन के साथ जुड़ते हैं।
अपना साक्षात्कार करते हैं, अपनी पहचान पाते हैं।
अपनी पहचान पाना ही मौलिक रुपांतरण ही पहली पहचान है।
क्रमशः नरेन्द्र नाथ