मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

sadhan yatra


ग्साधन यात्रा ग्








नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी
निवेदन


यह एक साधक की डायरी है, साधक की संकल्प यात्रा है, यहां पर किसी सिद्व का अनुभव जगत नहीं है। यही विनम्र निवेदन है। साधक होना ही कठिन है................क्योंकि मान्यता की स्वीकृति होते ही, जो छूटना होता है, वह स्वतः ही छूटता चला जाता है। बस शर्त यही है, यही स्वीकृति गहरी हो, आंतरिक हो..........जो एक बार जान लिया है, वही गहरा विश्वास बन जाए। मैं साधक हूं.............यह विश्वास गहरा होते ही साधन यात्रा शुरू होती है। यात्रा बाहरी नहीं, भीतरी है। पगडंडियों से लेकर चौराहे........सब यही है। जिनके प्रति एक गहरा साक्ष्य भाव मन सहेजता चला जाता है। इस यात्रा की जटिलता, सहजता तथा प्राप्त अनुभव जगत को संक्षेप में सहेजने का भाव ही यही है। जैसा कि पहले निवेदन किया, यहां यात्रा ही वरेण्य है...जिसका पहला छोर तो दिखाई देता है.... पर दूसरा............अभी नहीं। बस एक यही आवश्यकता शेष रहे,जो आप कह रहे हैं,जां आप कर रहे हैं ,उस पर आपका विश्वास पूरा होना चाहिए।

आशा है सुधी साधकों को अपनी साधन यात्रा में यह पुस्तिका सहायक होगी.......शुभकामनाओं के साथ।




नरेन्द्र नाथ











अनुक्रम:-





1. साधन क्यों ?
2. साधन का उपाय
3. साधन सूत्र
       4. साधन क्रम



साधन क्यों ?

यह प्रश्न और कहीं नहीं हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधन क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। पर अगर उत्तर नहीं में आए......तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है, यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है, जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास, सब उसी के रूप है। पेट की भूख और शरीर की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं है। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं भी बढ़ती है। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बर्हिमुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरंतर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है, वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता, उसे विश्राम की स्थति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अंत प्रशांति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके संपूर्ण जीवन की यात्रा है।वह गहरी नींद से जन्म लेता है फिर उसी में लौट जाता है।
विश्राम, मन की स्थिरता है, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अर्न्तमुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।
मनुष्य संभावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की संभावना। जैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है। और इन सब आवश्यकताओं का एक लंबा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यां चाहता हूं ? मैं, आखिर जीवित ही क्यों हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नही है, चलता ही रहता है। पढ़ना, रोज पढ़ना...........नौकरी तक......नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा तब तुष्टि किसे ?
अक्सर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे, इन सबके पीछे जो भीड़ है............वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार। उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए ।
यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और सकल्प पूर्ति का अभाव दुःख देता है।
यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख।
सुख अल्प है, दुख अनंत है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है...............एक बड़े आधार को खोज जो दुख दूर करेगा...........अनवरत सुख देगा।
अनंत सुख।
और यही नहीं मिलता है.................
शेष रह जाता है, विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यही से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज........
जहां अमृत है।
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो इसके पूर्व ही हजार कामनाएं पैदा हो जाती है। क्या वे सब पूरी हो पाती है ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती है।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा,.............प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में , समाज में, धन में, मकान में, धर्म में, यश में, हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नहीं है।
यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है, हमेशा आज मंे ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है उनसे कुछ मांगता है, और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है वही वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है उसका कभी नही हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है,परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कमी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका है। हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है, अपने को छोड़कर, परे सुख को खोज करना।
जो स्वभाव है, जो है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण की तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख, दुखी के उद्वार के लिए आता है। उसकी समझ को जागृत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ”जो है“ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है, खोजी होता है।
”जो“ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था अभी भी जीवन में था, पर बुद्वि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही अविवेक छूटता है। विवेक ”जो“ है उसके प्रति आदर भाव तथा ”जो“ नहीं है उसके प्रति अनादर का भाव जगाता है। आदर  का भाव ज्यों ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते है। विवेक के जागृत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है वह आचरण में आने लगता है।
साधन प्रारम्भ हो जाता है।
साधन कहीं बाहर नहीं, अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बाधक है। जो स्मृतियांे तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है।
यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नहीं होगी तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख है वह जगत के कारण से है। जगत ही सुख देने वाला है। जगत ही दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती, अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती है। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही, वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह में डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति मंे प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत है। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा बिम्ब रहा। जाते ही जल फिर वही दर्पण का दर्पण।
यही तो प्रशांत मन है।
उस दिन पाया, शरद के शांत सरोवर में भी हवा के स्पर्श से लहरें उठ गयी। तब जाना मात्र सरोवर का उद्वेलन हीन होना ही साध्य नहीं है। कामना निवृत्ति से प्राप्त शांति भी स्थायी नहीं है। उसमे रहने का भाव, साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार जगा देता है। यहां से पार जाना ही कठिन है।
उसके जगते ही यह जो दूसरा है, संसार है, वह उपस्थित हो जाता है। हो सकता है, साधक उपदेशक बन जाए, ऋषि महर्षि हो जाए, भगवान बन बैठे। संसार पर प्रभाव डालने की आकांक्षा बलवती हो जाती है। साधक अपनी विशिष्टता स्थापित करने के प्रयास में डूब जाता है। वह पुनः संसार के आकर्षण में लौट आता है।
तो फिर ?
जल का बर्फ हो जाना ही यहां साध्य है। सुख दुख, शांति से परे ”जो“ है वही साध्य है। यह सच है शांति बहुमूल्य है। पर अंत मे उससे भी परे जाना है। तभी ”जो“ है उसकी प्राप्ति संभव है। साध्य वही है। जो नित्य है, तथा जिसकी प्राप्ति से नित्य अभय और नित्य शांति प्राप्त होती है। यही धर्म का रहस्य है। जो धार्मिक है वह इसे पाने में समर्थ है। जिसकी प्राप्ति सहज हो, जो दूर नहीं जो विनाश युक्त न हो, तथा जिसमें आत्मीयता हो। जो इसी जीवन में, आज में अभी ही प्राप्त किया जा सकता है, वही साध्य है। साधन की सही समझ और विवेक के प्रति आदर भाव साध्य से अवश्य ही मिला देता है। जीवन आज में, अभी में, वर्तमान में ही जिया जाता है। वही साध्य उपस्थित है। विवेक का आदर होते ही मन की रूग्णता चली जाती है, जो दुख का कारण है।
हॉं, यह जो कल है,हमेशा स्मृति की कोटर से निकल कर आता है, वहीं वापिस लौट जाता है।स्मृति जननी है ,वह निरंतर विचारणा को सृजित करती रहती है।अवधारणा
ीभी वहीं जगह पाती है।यह वह ऐसा है, वह तो ऐसा ही है,विचारणा ,अवधारणा का आधार पाकर और पुख्ता होती जाती है।तब विचार बन जाता है। यही विचार मन का
 ही स्वरूप है। विचार जैसा होता है,मन वैसा ही होजाता है। विचारों का परिवर्तन ही   मौलिक परिवर्त्तन है।
विचार ही भय है, विचार ही घृणा है,विचार ही लोभ है,वही राक्षस भी बना सकता है,और निर्विचारता ही परमात्मा है,वहीं शक्ति है,वहीं शांति है।वह और कहीं दूर नहीं स्वयं के समीप है,जब यह जाना जाता है,तब जानने की जिज्ञासा में जो प्रयास अब तक किए थे तब उनकी अर्थहीनता का पता लगता है।
पूज्य स्वामी जी कहाकरते थे,‘ प्रयासों की आवश्यकता है ,यह जानने के लिए कि उनकी आवश्यकता नहीं रही है।’
शांत रहने के लिए ,शक्ति पाने के लिए आवश्यक है,हम मन के नियंत्रण के लिए,विचारों के नियंत्रण के लिए प्रयास करें।
यही आध्यात्म का मार्ग है,जिसका प्रवेश हमारे अंतः करण से ही होता है।







साधन का उपाय

”जो है“ उसी पर ही ध्यान केन्द्रित रहे यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहता है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर, मन और संसार सब बदल रहे है। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर में क्या अंतर है ? जो निरन्तर बदल रहा है वह सत्य नहीं। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है, उसी का ही चिंतन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह जो है उस पर जब ध्यान पहुंचता है तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान ”जो है“ उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है, वह मन है। तभी तो सारा ब्राह्यंड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान मनोनिग्रह का साधन कहा गया है।
प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यंत्र, रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान मात्र एकाग्रता नही है। एकाग्रता मन का बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मंत्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। एकाग्रता के बाद ही अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होती है। परन्तु एकाग्रता को ही साधन यात्रा स्वीकारने से साधक साधक पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा यह मंत्र यह नाम फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनः और अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान“ एकाग्रता नही है।
”ध्यान“ सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन का पथ  है,यह भी आंशिक सही है। हम जो भीतर है, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही सही विश्वसनीय पहचान हो,यहां ”ध्यान“ प्रक्रिया है। हम जो हैं एक स्थिर इकाई नही है। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आन्तरिकता नही है।
मन के संकल्प विकल्प की अनवरत श्रंृखला है। इसी श्रृंखला, इसी विचारणा का सतर्कता पूर्वक किया गया अवलोकन होना ,ध्यान  की प्रक्रिया हैै।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नहीं रखना है। बनी बनाई पूर्व निर्धारित कल्पना को क्या देखना । जो बात तय कर ली जाए, जैसे कोई नाम, कोई रूप उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही है, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर संपूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः  एक खालीपन एक गैप ,विचार और विचार के बीच में प्रदान करता है।
यह अंतराल  ही, यह खलीपन ही  साधना का एक पड़ाव है।
मन का आगे पीछे का चिंतन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह बेहोशी है, यह नींद है।
सच है हम जागते हुए भी सोए रहते है। कोई पूछे तो हमे लगता है, हम कहीं ओर थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधक स्वयं को प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलाएगा।
मन की गति असाधारण है। क्षण भर में ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती है। चित्र ही चित्र। न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे है। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम अपनी पूंजी मान बैठे है। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती है। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियां के साथ असहयोग करे तो संभव है कि मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है, न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पाऐंगे। जो कुछ है भीतर अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ उसे बाहर तो आने दे। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंद लाए जल को देखकर हम चौंक जाते हैं, और अस्वीकार करने लग जाते है। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते है। यह क्या है, यह तो पलायन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नही है। यह अज्ञान ही है। यहां हमारी जागरूकता यही है। कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम है हाजरी रहे।
छात्र कक्षा में आते हैं, बैठते हैं। पर जरा पूछो तो लगता है यहा थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान“ गायब होने का नाम नहीं, साक्षात अनुभवन है। जो कुछ है उसका विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्त्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नही है, हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन टूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञान रूपी कूड़ा कचरा जल कर राख हो जाता है। बंधन, वे पाश जिनसे हमने अपने आपको बांध रखा है, टूट जाते है। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते ही शेष रह जाता है, खुला आकाश निरभ्र और शांत जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रख कर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती है। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवद् इच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख दुख के झंझावत से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। यही भगवत्इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाए रखती है।
शास्त्रों में इसे ही योगमाया कहा जाता है। यही सोच मोक्ष अभिलाषा है यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा...... संसार से पलायन नही है।
यह संसार के प्रति सही संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आम्यंतरिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशांत रखता है, उसे दूर करने का है। इसलिए यहां व्यक्तित्व का संपूर्ण रूपान्तरण है। यहां आभ्यांतर तथा बाहय जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म को साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्मभाव से ऊपर उठ कर  आत्मानुभव ही नही हैं, परन्तु साथ ही उस परमात्मभाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहंी ओर भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल भी तो स्थिर नहीं रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितना गंदलाया, जल है। हमेशा निज को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्यों वहीं तो इसका रस है। जब तक उसे संसार से निराशा नहीं होती तब तक मन का अपना जो स्वरूप है वहां लौटना असंभव ही है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं है। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती है। ज्यों ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यो त्यों भगवत्कृपा के हम हकदार बनते चले जाते है। साथ ही जितनी भगवत कृपा हम पर होती रहेगी उतनी ही निम्न प्रकृति भी शुद्व होती रहेगी। यह साधारण नियम है। इसीलिए बर्हिजगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जाएगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन को छोड़ा ही छूटा है, और मन का ग्रहण किया चिपटा है।
चित्त शुद्वि और भगवत कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते है। यही साधन यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति उस विराट शांति की जिसके लिए हम इस अर्न्तयात्रा पर गतिशील है।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिस में जिस संसार की उपस्थिति है उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
कभी आचार्य ने कहा था। ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है। और साथ ही जगत ही ब्रह्म है।
यह तीसरा कथन अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही तो आध्यात्मिक यात्रा की उपलब्धि है। यह पूर्व कथनों की अवहेलना न कर उन्हें ही अधिक स्पष्ट कर रहा है। यही वह स्थिति है जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान अनासक्ति भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक ही नहीं रह जाते हैं, वरन् आचरण मे स्वतः ही आ जाते है। यही तो भगवतकर्म है। जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करती है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन् जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठकला है। अभिलाषाओं से सन्यास ही तो विक्षोभ का अंत है। यही तो मोक्ष है।
इसीलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है और साथ ही इस शरीर को भगवतकर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती है वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती है। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए मनोनिग्रह के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से विक्षोभ का अंत संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है तभी सकल त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां है। जन्म जन्म का संस्कार है।
स्थिरता के लिए वांछनीय है, इन स्मृतियों से असहयोग। साधक स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। अतीत के जो निष्कर्ष हैं, वे साधन पथ के चयन मे सहायक तो हैं पर मन का बार बार स्मृतियांे जाना तनाव ही लाता है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है। वह अशुभ ही अधिक है। दुखद है। वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी। जब तक यह ताला बंद है। मन का शांत भाव में आना असंभव ही है।
हर साधक प्रयोगशील है । उसे चाहिये अनंत धैर्य अनंत प्रतीक्षा। साधन के प्रति गहरा विश्वास। जब तक विश्वास नहीं होगा, सफलता नही मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगता पूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। यह एकाग्रता से प्रारम्भ होकर स्थिरता प्रदान करता है। निरन्तर सजगता पूर्वक की गई मन की निगरानी स्थिरता प्रदान अवश्य करेगी। यहां कोई दबाव नही है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाह्य आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन् जो जरूरी नही है उसको छोड़ना है इसी से ”जो“ है उस स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है, आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक हो, पश्चाताप नहीं करना है।  पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो संपूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः, ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। और उसमें जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ”जो“ जरूरी नही है, उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी हे।
जहां भी रहे जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहे। हम वहीं रहे उसी क्षण में रहे।
स्मृतियां तथा आकांक्षाओं मे जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिंदगी से पलायन नही है। वरन् जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है। यहां संसार को छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं कोई विचित्र वेशभूषा धार ण करनी है,संसार में रहते हुए ही अपनी सर्वोत्तम भूमिका प्राप्त करनी है।हम जहां भी हैं ,जो भी कार्य कर रहे हैं,उस कार्य को बेहतर करते हुए,वहीं जीवन में सुख एवं शांति पासकते हैं।
साधन मात्र है ,निरंतर वर्त्तमान में रहने का अधिक से अधिक से अधिक अभ्यास रखना।यहां किसी भी प्रकार के पलायन की कोई आवश्यकता नहीं है,जितना हम वर्त्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते जाएंगे उतना ही  जिसे छूटना है वह स्वतः छूटता चला जाता है।सुख इन्द्रियों के माध्यम से मन ही प्राप्त करता है,स्थायी सुख ही शांति की ओर लेजाता है।







साधन सूत्र
पर यह यात्रा सहज नही है। इसमें कई रूकावटें है। सुख लोलुपता भय सौंपती है। भय है, जिन चीजों में जिन वस्तुओं में, रूपों में, व्यक्तियों में मन उलझ गया है, रस लेता है, उनके छूट जाने का। सच तो यह है कि इस सुख लोलुपता के कारण व्यक्ति सारी उमर दुख झेलते हुए भी उसके कारण को समझ नहीं पाता है। समझ भी लेता है तो छोड़ने का प्रयत्न नहीं करता। इसके विपरीत वह भक्ति के नाम पर इस लोलुपता की मांग ही अधिक करता है।भक्ति प्रायः साधक को भटकाती ही रहती है,वह याचक बनता चला जाता है।
1. बुद्वि और विवेक में अंतर है। विवेक सत्यरूपी सूर्य की किरण है जो हमेशा सतपथ की ओर बढ़ने के लिए संकेत करती है। बुद्वि का आदर  होने से सांसारिक लाभ तो मिलता ही है, साथ ही स्वार्थभावना भी बढ़ती है।
बुद्वि लाभ -हानि अधिक सोचती है। यहां सत-असत का भेद नहीं है।
अतः विवेक का आदर होना चाहिए। साधक को जो जाना गया है, उसका आदर करना चाहिए। बु(ि से जब हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं,हम गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देते हैं।
2. विवेक का आदर होते ही, देहाभिमान टूटता है। शरीर भाव बहुत ही पुख्ता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी यह नहीं जाता। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का ही गुलाम हो जाता है। यह सूक्ष्म अंहकार है।यहां हम जो सही है उसके समीप आजाते हैं।हम अपने पुरूषार्थ से परिचित ही नहीं होते हें उसका सदुपयोग भी करने में समर्थ हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत में इस अवस्था का बहुत ही सुंदर वर्णन है गोपियां जो सबकुछ छोड़ आयी, वे भी यह सोच कर कि उन जैसा प्रेम और कहीं नहीं कृष्ण जो प्राप्त थे उन्हे ही खो देती है। और तो और वह विशेष गोपिका जिसके साथ उन्होंने आराधना की थी। वह भी इसी अहमभाव में डूब जाती है और जब पाती है कि कृष्ण उसे भी छोड़ गये हैं.. वह व्याकुल हो उठती है।
कृष्ण के पदचिन्हों को ढूंएती हुयी अन्य गोपियां जब वहां पहुंचती है तो वे भी उसे उदास पाती है।
यह सूक्ष्म अहमभाव साधना में विघ्न उपस्थित करता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी व्यक्तित्व का मोह बना रहता है। यही द्वैत है। दूसरे से अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना। दरअसल गुणों का संग्रह करने की भावना भी बाधा उपस्थित करती है। जब तक गुण की सत्ता है तभी तक दोष भी विधमान है। अतः साधक को चाहिए कि वह विवेक का आदर करे। मैं ओरों से श्रेष्ठ हूं यह अहमभाव साधक को वहां पहुंचा देता है जहां से यात्रा शुरू हुई है। अतः यह याद रहे, साधना का यह अर्थ नहीं है कि दोषों की अस्वीकृति के साथ ही गुणों को स्वीकारता चला जाये। यह गुणों की स्वीकृति एक मान्यता बना देती है उससे मोह हो जाता है। यह मोह अभिमान पैदा करता है, फिर साधक वहीं का वहीं रह जाता है।
3. साधक के लिये जैसा कहा, दो रास्ते हैं - पहला संसार की महत्ता उसे सौंपता है। दूसरा संसार को कर्त्तव्य भूमि बताते हुये उसे दासता से मुक्त करता है। सुखों की उपासना उसे गुलाम बनाती है। व्यक्ति अजाने सुख की लालसा में गुलाम रह जाता है। साथ ही कामना पूर्ति का अभाव उसे व्यथित कर देता है, तथा कामना पूर्ति का सुख उसे प्रसन्नता देता है। वह इसे ईश्वर कृपा कहता है और प्राप्त दुख को हटाने के लिए सद्गुरू तथा भगवान की शरण लेता है। वह दुखी होते हुए भी संसार की गुलामी नहीं छोड़ पाता है। अधिकांश इसी स्थिति में जीते हैं। कामना पूर्ति का लोभ उन्हें व्यथित बनाए रखता है।
इसीलिए साधक को चाहिए कि वह इस विघ्न को समझे। प्राप्त समझ का आदर करे। समझ ही उसे स्वाधीनता की ओर अग्रसित करेगी। वह कामना का स्वरूप समझ पाएगा तथा अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को सहज भाव से जी सकेगा। समत्व बुद्वि यही है। साधक के लिए कामनाओं का पूरा होना या न होना समान ही है। परिस्थितियां प्रारब्धवश होती है। प्रयत्न उनका चिंतन नहीं उनकी सहज स्वीकृति है। उन्हें जिया जाए......उनका चिंतन व्यर्थ है। फल जो भी हो उसे प्रारब्ध मानकर स्वीकारा जाए। फल से पलायन तथा विचलित होना साधक के लिए उचित नही है। परिस्थितियां साधक में विवेक जागृत करने के लिए आती हैं।
जो भी कर्म सामने उपस्थित हुआ हे मन को अधिक से अधिक वहीं रखना चाहिए,किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।कर्म की पूर्णता निश्चित ही पूर्णता का फल स्थाई शांति में सौंपने में समर्थ है।
4. कई बार ऐसा होता है कि हम प्राप्त परिस्थिति में सुधार की बात करते है। यह नहीं होता तो कितना अच्छा था, शायद इसके स्थान पर यह दूसरी नौकरी मिलती तो मैं बहुत खुश रहता, यह विकल्पों की यात्रा बड़ी लम्बी है। यही प्रमाद  है, यही भ्रम है।
हर परिस्थिति प्रभु का प्रसाद है। प्रारब्धवश प्राप्त है। वह साधन के लिए ही है। परिस्थितियों में जान बूझकर किया गया परिवर्तन सिलसिले को बढ़ाता ही है। हां, यह जरूर है कि हर परिस्थिति का सदुपयोग किया जाए। सदुपयोग से परिस्थिति का भोग समाप्त हो जाता है। सुख के सदुपयोग से, विनय प्राप्त होता है। यह मनुष्यत्व है। दुख का सदुपयोग वैराग्य सौंपता है।वस्तु के प्रति आसक्ति कम होने लगती है,साथ ही हमें अपनी सहनशीलता, कठिनाइयों में प्रसन्नता का अनुभव भी होता है।परिस्थितियों की निंदा,दूसरों पर दोषारोपण,उचित नहीं है।
परिस्थितियां जो भी प्राप्त है, वही हमारा वरण है। उनकी स्वीकृति ही जीवन का आदर है। प्राप्त का सदुपयोग और अप्राप्त का चिंतन छोड़ देना ही उचित है। इससे अभ्यास मे बहुत ही सहायता मिलती है। यह साधक को वह मंगलमल विधान सौंपता है जिससे कि उसका पारिवारिक जीवन ही मंगलमय हो जाता है। जहां भी हम रहें, होश में रहें। तो हर कार्य कुशलता के साथ तो होता ही है, साथ ही करने का भाव भी छूटने लगता है। प्रायः यह जो हम भविष्य पर टालते हैं कि आज नहीं कल करूंगा पहले यह हो जाए तब वह करूं, यह चिंतन साधक के लिए उचित नही है।
जो करना है, आज ही करना है।
साधन के लिए हिमालय की किसी कंदरा में नहीं जाना है। जहां भी रहंे, जिस समय रहे, वहीं से शुरू किया जा सकता है। साधन का अस्तित्व ही वर्तमान मे है। न वह स्मृति में है, न जीवेषण में। इस तरह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग ही साधन का लक्ष्य होना चाहिए।
बाह्य यह जो जगत है, इसमे जो मान अपमान है, आदर भाव है, अवहेलना है, साधन क्षेत्र में इसकी कोई उपयोगिता नहीं।इसे एक सीरियल की तरह लेना चाहिए,ज्यादा विचलित होने की जरूरत नहीं है।यह संसार गतिशील है, जो परिस्थिति आज है कल नहीं रहेगी।इसलिए बात-बात पर उत्तेजित होना ,अशांत होना उचित नहीं है।
हर प्राणी जो किसी भी स्थिति मे है वह अपनी योग्यतानुसार अपने विवेक का आदर कर साधन निश्चित कर साध्य को पाने के लिए स्वतंत्र है। क्योंकि लक्ष्य मात्र अध्ीिक से अधिक वर्त्तमान में रहना है।
5. हर साधक, साधन का यह अर्थ समझता है कि यह उसके भौतिक लाभ में सहायक होगा। यह सोचना ही गलत नहीं हैै। परन्तु भौतिक सुख के लिए आवश्यक है कि प्रयत्न किया जाए। प्रयत्न की सफलता भौतिक सुख देती है। जो भी प्रयत्न हो पूरी ताकत से किया जाए।मन की शक्तियां अधिक से अधिक वहीं रहें।
यह कहना है कि जो साधक है, वे इस जीवन मे धनी होंगे, स्वस्थ होंगे, वस्तुएं प्राप्त करेंगे, यह सोचना ही गलत नहीं है। क्योंकि साधक जब अपने विवेक का आदर कर अपने पुरूषार्थ का सदुपयोग करता है तब उसे भौतिक सुख जो उसके प्रारब्ध से उसे प्राप्त होने हैं ,वे तो प्राप्त होंगे ही कर्मो की श्रेष्ठता से यह अवधि बढ़ती भी चली जाती है।

6. सीखना एक अनवरत क्रिया है। साधक के लिए आवश्यक है कि वह सदैव प्रयोगशील रहे। प्रयोग का अंत कहीं नहीं है और न ही प्रयोग दूसरे के अनुभवों पर आधारित है। हर साधक का पथ उसको खुद की यात्रा ही नही है वरन् वही उसका प्रयोग है। अतः यह उसे कभी नहीं भूलना कि वह साधक है और प्रयोेगरत है। प्रयोग वही कर सकता है जो जगा हुआ है। सोया हुआ कभी कुछ जान नहीं सकता। अनुभव के लिए जागरूकता आवश्यक है। अतः साधक को अपनी मान्यता की कभी विस्मृति नहीं होनी चाहिए।
7. इस विस्मृति से ही साधक प्रायः अपनी साधन प्रणाली से मोहकर बैठते है। जैसे जप करने वाले जप को ही साधन मान लेते है। आसन लगाने वाले आसन को कभी छोड़ नहीं पाते। यह याद रखना चाहिये कि साधन सामग्री जो है वह प्रयोग की सामग्री है। हर सामग्री प्रयोग में सदा काम नहीं आती। जो कभी प्रारम्भ में काम आती है। वह कुछ ही समय बाद छूट जाती है। प्रयोग में मोह नहीं रहता। हां, साध्य के प्रति, कुतूहल रह जाता है। साधक प्रायः अपनी साधना की प्रणाली से इतना एकाकार हो जाता है कि वह अपने साध्य को ही भूल जाता है। उसे ही सबकुछ मान बैठता है। यह सबसे बड़ा विघ्न है। साथ ही प्रणाली के प्रति यह जो आसक्ति है वह अहं भाव पैदा करती है। साधक अपने साध्य को छोड़ कर साधन को ही सबकुछ मान लेता है। इससे वह साध्य से विचलित हो जाता है।
8. साधन यात्रा मे सबसे बड़ी कठिनाई, छोड़ने और छूटने की होती है। साधन उबाऊ और नीरस नही है। जो अपने साध्य के प्रति समर्पित है, वह कभी नीरस नहीं हो सकता। उसमें तो नित्य प्रियता रहती है।
इसीलिए छोड़ने और छूटने पर अधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये। अगर वर्तमान का आदर रहे, व्यर्थ के चिंतन में मन को नहीं जाने दिया जाये तो जो कुछ छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। हां, आवश्यक है कि विवेक का पूरी तरह आदर किया जाए, विवेक जन्य आचरण रखा जाए, जिसे छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। जो जाना गया है उसका पूर्ण आदर किया जाये तभी आचरण में शुद्वता रहती है।
पर होता विपरीत ही है। साधक और सिद्व भी जो जाना गया है अपने आचरण में उससे विपरीत रहते है। अहं सबसे बड़ा विघ्न है। साधक के लिए गुणी का आरोपण नहीं होना चाहिए। ऊपर से ओढ़ने के स्थान पर , विवेक का आदर और उसके अनुरूप आचरण ही पर्याप्त है।
9. साधक के लिए जो प्राप्त हो चुका है। प्रारब्धवश मिला है, वह उसके ही कृत संकल्पों का परिणाम है। यह जान लेना ही आवश्यक है। जो संबंध प्रारब्धवश बन गए हैं, माने गए हैं उनके प्रति कर्तव्य परायणता आवश्यक है। जो संबंधों को तोड़कर भगने को साधन मान बैठे हैं। वह कहीं भी लाभ नहीं ले सकते।
हां, जो संबंध हैं ? वहां अधिकार भावना के स्थान पर सेवा का भाव रखने से साधन में सफलता मिलती है। सेवक के लिए कर्त्तवय परायण होना आवश्यक है। जो हमारा है उसका ही हम त्याग कर सकते हैं, त्याग हम अपनी स्मृयिों का ही कर सकते हैं, वे ही हमारी संपत्ति हैं। वस्त्र बदलना ,घर छोड़ना, कोई त्याग नहीं है, घन की वस्त्रों की ,भोजन की आवश्यकता सभी को होती है,सन्यासियों की आवश्यकताएं गृहस्थों से अध्ीिक होती हैं।इसलिए त्यागी होना आवश्यक है। जोे निरंतर वर्त्तमान में रहना चाहता है वही त्यागी है। वैराग्य वस्त्रों का परिवर्त्तन नहीं है, अनावश्यक कल्पनाओं के बोझ को छोड़ते जाना ही वैराग्य है।साधक को चाहिए कि वह परमात्म भाव से  कर्त्तव्य कर्म करे, यही वास्तविक सेवा है। जो संबंध है, उनकी कर्तव्य भावना से पूर्ति करे।
10. साधक मे अपने साधन के प्रति अनन्य प्रेम, विश्वास जब तक नहीं होगा उसे सफलता नहीं मिलेगी। प्रायः साधक सारी उम्र साधन तलाश करते रहते हैं, जबकि साधन उनके ही पास उपलब्ध है। जो असाधन है उसका त्याग हो तो साधन है। पर वे भटकते रहते है। शास्त्रों का अध्ययन करते है तो वहां भी शंका करते है। सद्गुरू से मिलते है तो तार्किक बुद्वि ले आते है। गुरूवाणी मे तलाशते हैं कि यह शास्त्रों से कितना मेल खाता है। हर जगह वे संदेह से भरे रहते है। यह पहले ही कहा गया है कि रास्ते अलग अलग है मंजिल एक ही है।
हां, रास्ता चुनने से पहले खूब सोच लो, तर्क कर लो, पर जब समझ आ गई हो तो तब चलना ही श्रेयस्कर है। वहां वादविवाद होना, संदेह होना लाभप्रद नही है।एक ही सफलता का सूत्रा है जो भी हम कहें ,जोभी हम करें उसके प्रति हमारे भीतर पूर्ण विश्वास हो।
11. साधन यात्रा में सबसे बड़ी कठिनाई, साधन के चयन की है। साधन का यचन अपनी योग्यता तथा आवश्यकतानुसार होना चाहिए। हर साधक अपनी मांग को अवश्य जानता है। फिर भी अगर निर्णय लेने में परेशानी हो, असुविधा हो तो सदगुरू की शरण में जाना चाहिए।
शिक्षक और सद्गुरू में भेद है।
शिक्षक जानकारी देगा। शास्त्र वचनों के आधार पर साधक को समझाएगा पर सद्गुरू निजी अनुभव के आलोक में साधक के विवेक को जागृत करेगा।
विवेक अलौकिक है। वह एकाग्रता का फल है।
सद्गुरू पर पूर्ण विश्वास करके उसके आदेशों को स्वीकार करना चाहिए। साथ ही अन्य साधकों से न तो अपनी तुलना करनी चाहिए और न ही उनका अनुकरण करना चाहिए। सब अपनी योग्यतानुसार बढ़ते है।
जिस प्रकार एक ही रोग की एक ही दवा तथा एक ही पथ्य होते हुए भी रोग की अवस्थानुसार रोगियों को अलग अलग मात्राऐं दी जाती है, वही स्थिति साधन प्रणाली की है। हर साधन हरेक के लिए आवश्यक नही है।
12. साधन यात्रा मे कई पड़ाव आते है। साधक प्रायः एक दूसरे को देखकर मन में कई बार हीनता का भाव ले आत है। इसलिए प्रायः साधन को प्रायः गुप्त रखने के लिए कहा जाता है प्रायः जो अतिरिक्त अनुभूतियां हैं वे एक दूसरे की समान नहीं हो।
उदाहरण के लिए एकाग्रता कर अंतिम अवस्था में कई बार साधको को प्रकाशपुंजों का जो कि बैंगनी रंग के होेेेेेेेेते है दर्शन होते हैं, किसी किसी की यह न हो कर अनवरत ध्वनियां सुनाई देती है, प्रारम्भ में ये बहुत तीव्र होती है साधक डर जाता है, वह कान मे दवाई डालने लग जाता है किसी की सूक्ष्म नाद, झींगुर की तरह या घुंघरू की तरह सुनाई देता है। नाद की कई अवस्थाएं है। परन्तु सच तो यह है कि हर साधक के अनुभव दूसरे से पृथक है।
यही स्थिति स्वप्न और ”विजन“ की है। स्वप्न और ”विजन“ में अंतर है। विजन स्थाई सा रहता है। आंख खोले रखने पर भी उसकी प्रतीती होती है। पर ये विजन तथा स्वप्न हर साधक की स्थितियों के आधार पर अलग अलग होते है।
प्रायः साधक यहां अनुकरण शुरू कर देते है। इस बारे मंे कई बार जो         धारणाएं बन जाती है। उन्हें ही वे पाने का प्रयास करते है।
साधक अपनी साधन यात्रा से विचलित हो जाता है।
13. साथ ही साधको की भी अवस्थाएं है। उनकी मानसिक अवस्था के आधार पर उनके भेद हैं । कुछ हैं जो अपने दोषों से, अपने दुख से इतने व्याकुल हैं कि वे निर्दोषिता प्राप्त करने के लिए चल दिए है। उनका हर पल साधन को समर्पित है।
कुछ साधक है, समझते भी हैं। समझ का आदर भी करते हैं, पर सुख लोलुपता छोड़ नहीं  पाते है। से साधन मे स्थिर नहीं रह पाते और तो और वे अपने दुख का कारण अपने से बाहर तलाशते हुए उसके रूपांतरण का प्रयास भी करते है। वे जानते हुए भी आचरण में अपनी समझ को नहीं ला पाते। कहते हैं, समझ तो गया परन्तु अभी इसके लिए समय नही है। उन्हें दोष पता तो है परन्तु अभी व्याकुलता बढ़ी नही है कि वे बदलने के लिए प्रयास करें।
इसलिए सद्गुरू सत्संग और सद्गुरू की शरण एक मात्र आधार है।
सत्संग से आत्म प्रशंसा रूकती है और निज का दोष दर्शन शुरू होता है। वह समझ का आदर करने लगता है।
सदगुरू की आज्ञा मानते ही विनय प्राप्त होता है। विनय ही विवेका की तरफ ले जाता है। विनय ही अंहकार को तोड़ता है। अंहकार ही अविद्याा का जनक है। इसलिए विनय महत्वपूर्ण है। विनय अलौकिक है। विनय ही विाद्या प्रदान करता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है।
सर्वाधिक संख्या उनकी है जो विवेक का महत्व समझते तो है परन्तु अपने आपको इस दुख से इस दोष से, बाहर आने में असमर्थ मान लेते है। वे संसार की भागदौड़ में उलझ कर ही रह जाते है। यहां, बुढ़ापा ही भगवान के भजन के लिए छोड़ दिया गया है। इनके लिए वर्तमान में तो समय है ही नहीं। ये सब उधार की जिंदगी जी रहे है। उनके लिए खुद के लिए एक मिनट भी नही है। वे जीवेषणा में जीवित है। वे भविष्योन्मुखी है। कल में ही वे सबकुछ करना चाहते है। ये लोग सद्गुरू के पास भी जाते हैं तो भौतिक सुख को कामना ही शेष रहती है।
इनसे भी नीची अवस्था उनकी होती है जो प्राप्त समझ का दुरूपयोग करते है। ये आध्यात्मिक जानकारी को पेट भरने का धंधा बना लेते है। ये आध्यात्मिक सूचनाएं बेचते हैं। धन ही इनका लक्ष्य रहता है। ये स्वयं साधन यात्रा पर न होते हुए भी साधन की चर्चा सर्वाधिक करते हैं इन ज्ञान बंधुओं को साधन का लाभ कभी प्राप्त नहीं होता है।यह आवश्यक नहीं है घर वापिस पहुंचने के बाद वापसी इसी रूप में हो,इन परिस्थिितियों से भी बदतर स्थ्तिि में लौटना हो सकता है।यह जीवन अत्यध्ीिक महत्वपूर्ण है।सार्म्थ्य का सदुपयोग ही सार तत्व है।
14. हर साधक को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि साधन यात्रा में आत्म प्रशंसा ही शत्रु है मन जो हीन भावना से ग्रस्त रहता है वह स्वयं ही अपनी प्रशंसा में लिप्त हो जाता है।
क्यों ?
यहां भी तो संतोष मिलता है। पर आत्म प्रशंसा व्यक्ति के विकास में     बाधक है। वह कभी आपको अपने आपसे संलग्न नहीं कर पाती। दूर ही रखती है।
आत्म प्रशंसा-आत्मनिरीक्षण में बाधक है। जब हम अपने दोषों से जी चुराना चाहते है। तभी आत्म प्रशंसा में डूबते है। खोलखलापन जो है, वहां गूंज जोरों से होती है। ओर जो दोष है, वे उसी रूप में विधमान रहते है। अगर देखनी है तो अपनी बुराई देखिए।
15. दूसरों के दोष देखने से निज का अंहभाव दृढ़ ही होता है। आत्मनिरीक्षण रूक जाता है। साधन पथ में यह सर्वथा अहितकर है। पर दोष चिंतन में मन असाधारण गतिशील होता है उसे रस मिलता है। निंदा स्तुति ही प्रायः मनुष्य की पहचान हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह इससे बेचे।
परदोष चिंतन और आत्मप्रशंसा का मुख्य कारण है,
वाचालता।
हमें कुछ ना कुछ बोलने की आदत ही हो गई है। साधन यात्रा में अगर संयम करना ही है तो वाकसंयम आवश्यक है।
जब साधक निरन्तर बोलता है, तब दो ही रास्ते बने हैं -
1. आत्म प्रशंसा 2. परदोष दर्शन।
इससे मन और अधिक विक्षोभ में डूबता है। तनाव रहता है।
साधन में यह बाधक है।
16. वाचालता का प्रमुख कारण स्मृति है।
स्मृतियां ही व्यर्थ का चिंतन करती है।
मन जब व्यर्थ का चिंतन करता है तब आवश्यक संकल्पों की पूर्ति नहीं हो पाती। कर्म  तभी सफल हो पाता है जब अनावश्यक विचारणा का दबाब नहीं होता है। यहीं कर्म कर्तव्य बुद्वि से जन्य होकर सार्थकता देने में सफल होता है।
यह व्यर्थ का चिंतन होता है, स्मृतियों में रस लेने से । स्मृतियां ही तो अचेतन मन में संग्रहित है। उनके साथ असहयोग होते ही उनकी अर्थवत्ता समाप्त हो जाती है वर्तमान में रहने की यही कला है कि स्मृतियों के साथ सहयोग न किया जाये। तभी आगे पीछे का व्यर्थ चिंतन रोका जा सकता है।
स्मृतियों का दबाब कम से कम होता जाए इसके लिए आवश्यक है:-
1 आप शांत होकर बैठें संकल्प लें आप किसी से भी नाराज नहीं हैं,जिनके प्रति नाराजगी है ,उन्हें याद करें ,उन्हें अपने अंतः करण से क्षमा करदंे।जिस को भी आप अपना इष्अ मानते हैं कल्पना करें वे आपके साक्षी हैं।
2 जो आप से नाराज हैं,उनको याद कर उनसे भीष्ष्क्षमा मांगें।
दस दिन बाद आप पाएंगे आपके विचार भी कम होने लग गए हैं
विचारों के कम होते ही विकारों का कम होजाना स्वाभाविक है।इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है।



















साधन क्रम
साधन पथ रूपी त्रिभुज को अभ्यास, सत्संग और स्वाध्याय ये तीन भुजाएं है। जो साधन यात्रा की संपूर्णता देती है। स्वाध्याय सत्संग के लिए प्रेरित करता है और सत्संग अभ्यास के लिए तभी साधक संपूर्णता पाता है।
यह शास्त्रानुसार प्रदर्शित मार्ग है।
स्वाध्याय
स्वाध्याय ही सामान्य व्यक्ति को साधन पथ सौंपता है। स्वाध्याय जीवन में नियमित रहना चाहिए। मन की स्थिरता के लिए और पथ की तलाश के लिए आवश्यक है कि सद्ग्रन्थों का नियमित अययन होता रहे।
स्वाध्याय - स्व का अध्ययन है। यह हमें आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाता है। इसलिए स्वाध्याय का अर्थ मात्र शास्त्र अध्ययन से नही है।
अगर जीवन में सद्गुरू प्राप्त न हो तो, साधन यात्रा में सद्ग्रन्थों को ही सद्गुरू मान कर उनके आधार पर साधन की समस्याओं को हल करना चाहिए।
वैसे सद्गुरू के द्वारा बताए गए सद्ग्रन्थ ही उपयोगी होते है। वे रोगी के रोग को देखकर ही दवा देते है। अन्यथा पुस्तकालय तो दवाई की दुकानों की तरह होता है।
ग्रन्थों को समझ के लिए भी पर्याप्त समझ चाहिए। अंधों के लिए जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश व्यर्थ है उसी प्रकार सद्ग्रन्थों का अध्ययन विवेक के प्रकाश में ही होता है।
अतः साधको को चाहिए कि गुरू आज्ञा से ही वह स्वाध्याय मे रत रहे। ये ग्रन्थ मनोरंजन के लिए नही है। साधन ग्रन्थ पहले सद्गुरू दिया करते थे। अब छापे खाने हो गये है। सभी तरह के ग्रन्थ उपलब्ध है। अतः अनर्थ अधिक हो गया है। साधन सूत्र यहां रूपक कथाओं में हैं।प्राप्त विवेक का आदर हमारे व्यवहार को बदलने में सहायक होता है। जो सही है, और सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है ,वही विवेक है।
सत्संग -
सत्संग और सद्चर्चा मे अंतर है। असत का त्याग होने पर सत्संग अपने आप हो जाता है। प्रायः सत्संग के नाम पर जब हम एकत्रित होते हैं, गपशप ही अधिक करते है। बातें करते हैं। कहा करते हैं हम सत्संग में गए थे। जब तक भीतर से परिवर्तन न हो, और आप खुद न करना चाहे, सत्संग आप नहीं कर सकते।
अभ्यास और सत्संग विवेक के ही दो पहलू है। अभ्यास ही सत्संग है और सत्संग ही अभ्यास है। इसीलिए जहां तक हो सके सद्चर्चाओं के स्थान पर सत्संग ही किया जाना चाहिए।
आत्मनिरीक्षण ही व्यक्तिगत सत्संग है। यहां साधक को ”जो है“ साक्षात्कार, अनुभवन का अभ्यास करना है। परन्तु साधक को आंतरिक गहरे मौन में स्मृतियां पास नही रहने देती। मूक सत्संग में सबसे बड़ी बाधा यही है। इन स्मृतियों के असहयोग से संबंध विच्छेद से इनसे बचा जा सकता है। संबंध समाप्त होते ही इनकी सत्ता समाप्त हो जाती है। फिर इनका प्रभाव नहीं पड़ता है। परन्तु यह होना सहज और सरल नही है।
जब साधक अपने एकांत सत्संग मे प्रवेश करने मे पने आपको असफल समझता है। तब उसे चाहिए कि उन कुछ लोगों को जिन्हें साधन में रूचि है। समान भाव है। उसे साथ बैठना चाहिए।
यह सामूहिक अभ्यास भी लाभकारी है।
परन्तु यहां पर दोष चिंतन के स्थान पर निज के दोषों की चर्चा करनी चाहिए। उन्हें दूर करने के उपाय तलाश करने चाहिए।
सत्संग का अर्थ भजन कीर्तन नही है। न ही शास्त्र श्रवण है। परन्तु बहुत गहरे में अपने ”सत“ से युक्त होना है। इस तकनीक को जिसने समझा है वही साधन यात्रा का लाभ ले पाया है। क्यांेकि यात्रा में कई पड़ाव आते है। कोई साधक आगे, कोई साधक पीछे रहता है। कई समस्याएं सभी को एक जैसी पार करनी पड़ती है। जहां पर भी जिस साधक ने अपनी समस्याओं को जिस प्रकार दूर किया है, समाधान जानना लाभकारी रहता है।
साधन यात्रा अनवरत प्रयोग है। जब तक परिणाम प्राप्त न हो तब तक प्रयोग नही छूटता है।
अतः सत्संग को श्रेष्ठ साधन समझकर ग्रहण करना चाहिए।
इस जीवन मे कभी कभी ऐसा होता है जो सत है, जो जीवन मुक्त है, उनकी कृपा दृष्टि भी हो जाती है।
यदि साधक स्वयं अपनी जिज्ञासाओं के समाधान मे असफलता पा रहा है, उसे कुछ पूछना शेष रह गया हो, जानना शेष रह गया हो। वह पाता है कि उसके विक्षोभ को वह दूर नही कर पा रहा है बैचेनी है। तो फिर किसी सद्गुरू की शरण में जाना चाहिए।
सद्गुरू की पहले खूब जांच पड़ताल रखनी चाहिए। बुद्वि लाभ, लोभ की दासी अवश्य है, पर वह बारीकी से जांच पड़ताल करने मे समर्थ है। जिसमें अपने जानते हुए किसी प्रकार का दोष नहीं दिखता हो। जिसके सम्मुख अंहकार झुकना  चाहता हो। क्योंकि मन का स्वभाव यही है कि वह अपने से बड़े के सम्मुख श्रेष्ठ के सम्मुख स्वतः ही झुक जाता है।
यह समर्पण जो है, अस्वाभाविक नही है। यहां सम्मुख होते ही शांति की लहरों में साधक अपने आप को पाता है।
शांत सरोवर जिस प्रकार अपने संसर्ग से चित्त की बैचेनी दूर कर देता है उसी प्रकार संतो के प्रेमिल चित्त साधक के मन में प्रेम की धाराएं उत्पन्ना कर देते है। यह उनके संसर्ग का ही परिणाम है कि अपने भीतर गहरी शांति अनुभव करता है।
परन्तु यह ध्यान रहे, यहां तर्क नहीं, शंका नहीं। वरण का अधिकार एक बार का ही है।
पर होता विपरीत है।
साधक की सद्गुरू के प्रति श्रर्द्वा नहीं होती। वह वहां भी सांसारिक लाभ के लिए जाता है। व्यर्थ की चर्चाएं करता है।
साथ ही वह जैसे कपड़े बदलता है, वैसे ही वह गुरू बदल लेता है।
परिणाम यह रहता है कि वह लाभ नहींले पाता है। उसके भीतर परिवर्तन नही आता है।
सद्गुरू मनोरंजन नहीं करते। वे अनुभव के स्त्रोत है। साधक के अनुभवन को जागृत करते हैं, पर आवश्यक है कि उनके परामर्श पर अमल किया जाए।
अभ्यास:-
अपने  आप से संसार को हटा लेना ही अभ्यास है। यह सब एक ही दिन एक ही क्षण में तो नहीं होने वाला है, परन्तु निरन्तर अभ्यास से ही इसे पा अवश्य सकते है। संसार संकल्प रूप ही है। इच्छा कि उत्पत्ति ही दुख है। उसकी पूर्ति सुख है, और इच्छाएं अनन्त है, अतः हर इच्छा की पूर्ति असंभव ही है। परिणामतः दुख ही दुख है। अतः इच्छा की निवृत्ति ही आनन्द है। यही पूर्णता मिलती है। संसार की सहायता से पूर्णता नहीं मिलती है। यह संसार हर क्षण और अभाव बढ़ा सकता है। गरीबी दे सकता है। और जो अभाव में है  उसका चित्त कभी शांत नहीं हो सकता।
साधक को चाहिए कि वह क्षण को जो उनके सामने उपस्थित है, सार्थकता प्रदान करे। यह सार्थकता उस क्षण को अनुभव में बदल कर हम पा सकते हैं अनुभव के लिए वर्तमान मे रहना होगा। आगे पीछे भटकना, मन का भूत और भविष्य में हो रहा संक्रमण हमें रोकना चाहिए। यह भटकाव हमारी शक्तियों को विघटित करता है। मन जितना अतीत और भविष्य के भटकाव से पृथक होगा, उतनी ही वह सार्थकता प्राप्त कर सकेगा। भगवत कर्म से युक्त होने का यही सार्थक प्रयत्न है।
इसीलिए जिन चीीजों को अपने अंदर रख रखा है, उन्हें धीरे धीरे हटाते चले जाना ही यहां अभ्यास है। मन संकल्प रूप है, उसकी अशुद्वि दो प्रकार की है। एक तो वह चंचल है, दूसरा वह मलिन है। मलिनता और चंचलता, स्थिरता पाते ही दूर होती है। जितनी अधिक स्थिरता प्राप्त हो जाएगी, विवेक ओर स्पर्श से मलिनता भी दूर हो जाएगी, और कर्म, भगवत कर्म में रूपांतरित होता चला जाएगा।
इसीलिए साधक के लिए आवश्यक है, वह आत्मरिीक्षण की ओर बढ़े।
आत्म निरीक्षण
ध्यान योगी के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिकता में विचरण करे। मनोजगत मे पेठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे है। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है परन्तु यहां पर किसी और अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण औश्र दोष को ही जीवन मान बैठे है। जीवन जो है, जिस रूप मे है। उसके मूल यप को जान ही नहीं पाते।
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है..........यह मुझे दूर करना है तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विधमान है। राग द्वेष को समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना, बस इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नहीं करना है, ब्राह्य से लाकर कुद आरोपित नहीं करना है जो है उसका सतर्कता पूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई संकल्प नही है रूपांतरण की चाहत भी नही है तभी तो जो है उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान मे रूपान्तरण को क्रिया शुरू हो जाती है तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द्व, यह ध्यान नही है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर.............मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नहीं। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति भावना नहीं, जो है उसे ही निःसंकल्पता से देखना है, बस नाव चलती रहे चलती रहे तभी यह अर्न्तयात्रा संभव है। यह निःसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचरणा का अवलोकन हो यह हमें प्रदान करता है।
इसीलिए आवश्यक है काल के इस अमूल्य क्षण मे मन अत्यधिक संवेदनशील हो, औश्र यह तभी संभव है, कि विचारणा ही नहीं रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभवकर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है अनुभव और अनुभवकर्ता पृथक हो जाते हैं इसीलिए हम पाते हैं हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते है। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य मे मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है निःसंकल्पता, एक गहरा मौन यही तो हमारा         ध्येय है।
ध्यान योग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा भागवत भाव की प्राप्ति होती है, वही जीवन भगवत कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है यहां है सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं ?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भागवत इच्छा ही प्राणों की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अंत में जाकर यह भी परमात्मा मे विलीन हो जाती है। अतः प्रयत्न यहंा निंदनीय नही है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही हे।
ध्यान भोग का अभ्यास ही सर्वाधिक उपयोगी है।
इसीलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए उन विचारों को जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दे। बिना काम के विचार वे ही हैं जो कभी वर्तमान मे नहीं रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते है। यही तो चिन्ता है, जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्गजगत मे हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके मन एक क्षण में लाखांे मील की दूरी लांघ जाता है। ओर जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐंगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग करना लक्ष्य नही है हम चाहते हैं, उसका बर्फ बनाना जिससे कि फिर कभी र्कोइ लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही और नहीं अबतक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमें, अविचार से हटाते हुए उस संकल्पहीनता को सौंपता हैं जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत कर्म है यहीहमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं।
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर समय नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते है। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है तभी तक दुख है। पर न जाने कैसा भटकाव है। प्राणी दुख भागता हुआ भी सुख की भूल भुलैया में इतना उलझा रहता है...............तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्वियों की तलाश में हठयोग में, या सुख की कामना मे ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है , गुरू डम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन मे शास्त्रानुसार बताए मार्ग पर चलकर अभ्यास सत्संग और स्वाध्याय द्वाा ध्येय पाना ही है। ध्यान योग ही सहज और सुगम वह मार्ग है जो संतो का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो प्रयत्न आज से और अभी से ही किया जाए।
पहला कदम:-
जरूरी नहीं कि एक दिन एक ही क्षण में चमत्कार हो जाये। योग मार्ग पीपिलिका मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुयी वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुंच जाती है, वही भाव साधक के मन मे होना चाहिए। कम से कम दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना चाहिए। सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो  लेटे ही रहे। देखे मन क्या कर रहा, सतर्कता से आंतरिक विचारण का अवलोकन करे न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम मे है और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया समझाइये अभी तो विश्राम मे हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू शुरू मे मन नहीं मानेगा फिर ज्यों ज्यों अभ्यास बढ़ता जाएगा वह नियंत्रित होता चला जाएगा।   साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिये यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइये। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वांछा कर रहा है। उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के ओर रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिये। मन ही मन की निगरानी कर जब थक जाती हो तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का यह अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम:-
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाह्य नाम रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्राह्यनाद पर ही मन को स्थिर किया जाये। मन जब ठहरता है, तब अर्न्तजगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती है। संतो ने इनके कई रूप बतलाए हैं ज्यों ज्यों मन ठहरता जाता है, यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे कुछ भी करता रहे मन यहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा मे जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज जीभ है। स्वाद की   परिधि मे भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है।  क्योंकि इसके दो कार्य हैं, जब वह बाहर  आती है तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष दर्शन में लग जाती है। पर निंदा या चाटुकारी साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है वह बहरा भी होता है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन का परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते है तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते है। जब तक दोष दर्शन और पर निंदा उवाच जारी है हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नही सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसंधान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम की करना है।
अंत में:-
साधन यात्रा का प्रारम्भ ही एकाग्रता से होता है। अशुभ संकल्प जैसे जैसे मन वर्तमान मे रहना शुरू करता है, दूर होने लग जाते है।
स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।
अशुद्व और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।
यह वह स्थिति है जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद जो कल तक संगी था कहीं दूर चला गया है।
साथ ही अशुद्व संकल्प जो पर निंदा तथा पर अहित मे थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।
साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कर्तव्य परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुद्रिता, प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम आंतरिक है।
साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से, तनाव से भरा हुआ था। खाली हो गया है। वह गहरी शांति का अनुभव करता है।
साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे। वे भी बदल रहे है। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।
वह कर्तव्य कर्म से जुड़ता है।
कर्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं, स्वतः ही कम होने लगते है।
व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी विचारणा बढ़ जाती है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।
ओर भी आगे अगर साधन यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है ज्यों ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती जाती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन हो जाती है।
सघन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था वह स्वतः छूटता जा रहा है। जो पाना था। वह सवतः प्राप्त हो रहा है।
और भी आगे साधक को इस शांति से भी अलग होना पड़ता है। निरन्तर विचरण से साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार पुनः आकार ग्रहण कर लेता है। मैं श्रेष्ठ हूं। मैं शांत हूं। मैं जो था वह पुनः ताकतवर हो जाता है।
साधक गुणों के अभिमान में डूब जाता है। वहां से भी आगे बढ़ता होगा।
साधन यात्रा में यह पड़ाव है।
इसमे रहते हुए और आगे बढ़ना है।
बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही है। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते है।
सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।
आगे और आगे जो साधन यात्रा का पड़ाव है।
”जो“ है, स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे मे कुछ कहा नहीं जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारण के क्षेत्र में आता है तब भाषा भी उसे प्रकट करने मे असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नही है।
यह हर साधक का अधिकार है। स्वतंत्रता हर साधक का जन्म सिद्व       अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।
साधन यात्रा प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। अनवरत है। यहां प्रारम्भ तो दिखता है पर अंत नहीं। इसीलिए अनन्त धैर्य ओर अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।


सेवा प्रतिष्ठान
पोस्ट गुरूकुल जिला झालावाड़ ;राज0
-ःसर्वे भवन्तु सुखिनः-
निःस्वार्थ भाव से समाज सेवा करने  तथा अन्य समाज सेवी सज्जनों को समाज सेवा का सुअवसर प्रदान करने के शुभ संकल्पों से प्रेरित होकर इस क्षेत्र के आध्यात्म प्रेमी सज्जनों द्वारा गुरूकुल के प्रांगण में सेवा प्रतिष्ठान की स्थापना की है। सेवा कार्य सुचारू रूप से चलाने हेतु आजीवन तथा सहयोगी सदस्य बनाये जावें ऐसी प्रबंध समिति के सदस्यों की कामना है। प्रतिष्ठान द्वारा किये जाने वाले सेवा कार्यो का त्रेमासिक विवरण प्रत्येक सदस्य के पास भेजा जावेगा। अतः आध्यात्म प्रेमी एवं समाज सेवी सज्जनों से नम्र निवेदन है कि इस शुभ अवसर का लाा उठाकर मानव सेवा द्वारा परमपिता परमात्मा की सेवा के पवित्र कार्य में अपना सहयोग प्रदान करें।


निवेदक
प्रबंधक समितिसेवा प्रतिष्ठान

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यादें 4

मित्र ने कहा है ”,पुरानी बातों को भूल जाओ। सही है , जो हो चुका , वह होचुका , जो होगा देखा जाएगा। सही है।“


पर जो घटनाओं से परे है, जहॉं मात्र अनुभवन जगा था , वे ज्योतित क्षण, तथ्य नहीं होते। घटनाएॅं , नहीं बनते।
हम बरसों तक सदगुरु के साथ रहते हैं ,  उनके सानिध्य ूें वर्षों रहते हैं।  पर हम काष्ठवत हीी जीवन जी लेते हैं , पर जैसे गए थे , वैसे ही लौट आते हे। क्यों? जिस बुद्धि को मित्र मानते हैं , वही कहीं नमनीय नहीं होने देती।हमारी बुद्धि की तीव्रता अधिक से अधिक हमें ज्ञान बन्धु ही बना देती है। बचपन में जो कमाई साथ लाते हैं , बुढत्रापे में वह गंवय कर और उधार की पोटली बॉंधकर ले जाते  हैं।
कुछ बाते हैं , जो मित्रों के साथ साझा करने से अपना ही परिष्कार हो जाता हैं।

बात पुरानी है। तब गुरुकुल में बहुत कम लोग आते थेे। परंपरागत आश्रम जैसा वैसा कुछ वहॉं नहीं था। एक साधारण गैरिक वसन धारी संत के प्रति जो जिज्ञासा का भाव होता है , बस उससे कुछ अधिक था। स्वामीजी आध्यात्मिक चर्चाओं से बहुत दूर थे। हमारे सवाल प्रायः धर्म ग्रंथों के आधार पर होते थे वहॉं स्वामीजी चुप ही रहते थे।
गुरुकुल सरकार को सौंप दिया था। सुबह सरकारी स्कूल चलता था।  फिर दिन भर गहरी शांति रहती थी।
हमारे पास क्या था , तब पता नहीं , एक अदृष्य खिंचाव था। बस जैसे पूर्वनिर्धारित रहा हो। तब पहली बार सवाल पूछना शुरु किया था। स्वामीजी ने कृष्णमूर्ति की पुस्तक ”फ्रीडम फ्रोाम नोन “ मंगाकर पढ़ने का दी थी। वे जिस शिक्षण की ओर ले जारहे थे , तब उसका भान नहीं था।

उन दिनो , डाह्या भाई , मूलचंदजी , पोस्टमास्टर कन्हैयालाल जी से परिचय हुआ था। तब स्वामीजी के साथ भवानीमंडी जाना हुआ। कन्हैयालाल जी ओशो के सत्संग में हो आए थे। वे वहॉं से पुस्तकें साथ लाए थे।
एक दिन तब मैं भी गुरुकुल में था। ये तीनो आसन प्राणायाम पर बहुत जोर देते थे। मूलचंदजी के गुरु हरिद्वार में थे। स्वामीजी  कभी किसी को अपनी ओर से कोई सलाह नहीं देते थे।

वे उस दिन अपनी नियमित दिनचर्या के बाद कुटिया में आए , उन्होंने प्रणाम किया।  स्वामीजी ने कहा बैठ जाओ।
पोस्टमास्टर साहब ने हॅंसकर कहा स्वामीजी बैठ गए है।
स्वामीजी हॅंसे , अभी बैठे कहॉं हैं?
व्ेो चौंके , फिर बोले हम सब बैठे हैं , स्वामीजी।
”स्वामीजी हॅंसे , फिर उनकी ओर देखा , आपके पॉंव लगातार हिल क्यों रहे हैं? क्या कोई बीमारी है , या आपका मन कहीं बाहर भटक रहा है?
वे अवाक रह गए।”स्वामीजी आपने सही कहा, हम सब आज सलावद ( पास का गॉंव )  जाने की सोच रहे हैं।“
”तो हो आओ।“
तब मूलचंदजी ने बात संभाली , ”स्वामीजी कन्हैयालालजी बंबई से किताबें , लाए हे। ओशो ने कहा हे , वर्तमान में रहो, आप भी यही कहते हैं, कैसे रहा जाए?
तब स्वामीजी हॅंसे , बोले , जिन्होंने कहा है , वहॉं गए तो उनसे पूछ कर आते।
वे सकपकाए , ”स्साब वहॉं कहॉं पूछना , बस दूर से उनको देख लिया था।“
स्वामीजी फिर हॅंसे , उसी सवाल का उत्तर ही तो मैं दे रहा था।

आज वर्षों के बाद यही उत्तर हाथ आया है , सद्गुरु का सानिध्य ही सत्संग है। वे हर क्षण सिखा जाते है। बुद्धि ही बाधक रही जो , सवाल पर सवाल पूछती रही। ”जहॉं हैं , बस वहीं पूरे सौ टका हो जाएॅं ,शरीर मन प्राण की एक रसता ही तो वर्तमान है।  तभी हृदय का द्वार खुल जाता है।

शायउ चुप रहने की कला तब मिल जाती , तब सदगुरु के शब्द नहीं उनके हृदय से ही हम जुड़ जाते , पुरानी कहानी है , स्वप्न में परमात्मा ने कहा मैं सुबह आउंगा , पर तभी  नींद ने कहा यह तो सपना है , सुबह उठकर देखा , घर के बाहर किसी के आगमन की सूचना थी , उसके पांवों के निशान थे , वह तो आया भी और चला भी गया , पर हम मूढ़ता में ,अपने ही अज्ञान की गहरी नींद में सोते ही रह गए।


नरेन्द्र नाथ


sadhan yatra


ग्साधन यात्रा ग्








नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी
निवेदन


यह एक साधक की डायरी है, साधक की संकल्प यात्रा है, यहां पर किसी सिद्व का अनुभव जगत नहीं है। यही विनम्र निवेदन है। साधक होना ही कठिन है................क्योंकि मान्यता की स्वीकृति होते ही, जो छूटना होता है, वह स्वतः ही छूटता चला जाता है। बस शर्त यही है, यही स्वीकृति गहरी हो, आंतरिक हो..........जो एक बार जान लिया है, वही गहरा विश्वास बन जाए। मैं साधक हूं.............यह विश्वास गहरा होते ही साधन यात्रा शुरू होती है। यात्रा बाहरी नहीं, भीतरी है। पगडंडियों से लेकर चौराहे........सब यही है। जिनके प्रति एक गहरा साक्ष्य भाव मन सहेजता चला जाता है। इस यात्रा की जटिलता, सहजता तथा प्राप्त अनुभव जगत को संक्षेप में सहेजने का भाव ही यही है। जैसा कि पहले निवेदन किया, यहां यात्रा ही वरेण्य है...जिसका पहला छोर तो दिखाई देता है.... पर दूसरा............अभी नहीं। बस एक यही आवश्यकता शेष रहे,जो आप कह रहे हैं,जां आप कर रहे हैं ,उस पर आपका विश्वास पूरा होना चाहिए।

आशा है सुधी साधकों को अपनी साधन यात्रा में यह पुस्तिका सहायक होगी.......शुभकामनाओं के साथ।




नरेन्द्र नाथ











अनुक्रम:-





1. साधन क्यों ?
2. साधन का उपाय
3. साधन सूत्र
       4. साधन क्रम



साधन क्यों ?

यह प्रश्न और कहीं नहीं हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधन क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। पर अगर उत्तर नहीं में आए......तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है, यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है, जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास, सब उसी के रूप है। पेट की भूख और शरीर की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं है। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं भी बढ़ती है। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बर्हिमुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरंतर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है, वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता, उसे विश्राम की स्थति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अंत प्रशांति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके संपूर्ण जीवन की यात्रा है।वह गहरी नींद से जन्म लेता है फिर उसी में लौट जाता है।
विश्राम, मन की स्थिरता है, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अर्न्तमुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।
मनुष्य संभावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की संभावना। जैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है। और इन सब आवश्यकताओं का एक लंबा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यां चाहता हूं ? मैं, आखिर जीवित ही क्यों हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नही है, चलता ही रहता है। पढ़ना, रोज पढ़ना...........नौकरी तक......नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा तब तुष्टि किसे ?
अक्सर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे, इन सबके पीछे जो भीड़ है............वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार। उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए ।
यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और सकल्प पूर्ति का अभाव दुःख देता है।
यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख।
सुख अल्प है, दुख अनंत है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है...............एक बड़े आधार को खोज जो दुख दूर करेगा...........अनवरत सुख देगा।
अनंत सुख।
और यही नहीं मिलता है.................
शेष रह जाता है, विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यही से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज........
जहां अमृत है।
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो इसके पूर्व ही हजार कामनाएं पैदा हो जाती है। क्या वे सब पूरी हो पाती है ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती है।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा,.............प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में , समाज में, धन में, मकान में, धर्म में, यश में, हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नहीं है।
यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है, हमेशा आज मंे ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है उनसे कुछ मांगता है, और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है वही वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है उसका कभी नही हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है,परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कमी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका है। हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है, अपने को छोड़कर, परे सुख को खोज करना।
जो स्वभाव है, जो है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण की तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख, दुखी के उद्वार के लिए आता है। उसकी समझ को जागृत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ”जो है“ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है, खोजी होता है।
”जो“ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था अभी भी जीवन में था, पर बुद्वि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही अविवेक छूटता है। विवेक ”जो“ है उसके प्रति आदर भाव तथा ”जो“ नहीं है उसके प्रति अनादर का भाव जगाता है। आदर  का भाव ज्यों ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते है। विवेक के जागृत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है वह आचरण में आने लगता है।
साधन प्रारम्भ हो जाता है।
साधन कहीं बाहर नहीं, अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बाधक है। जो स्मृतियांे तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है।
यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नहीं होगी तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख है वह जगत के कारण से है। जगत ही सुख देने वाला है। जगत ही दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती, अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती है। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही, वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह में डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति मंे प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत है। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा बिम्ब रहा। जाते ही जल फिर वही दर्पण का दर्पण।
यही तो प्रशांत मन है।
उस दिन पाया, शरद के शांत सरोवर में भी हवा के स्पर्श से लहरें उठ गयी। तब जाना मात्र सरोवर का उद्वेलन हीन होना ही साध्य नहीं है। कामना निवृत्ति से प्राप्त शांति भी स्थायी नहीं है। उसमे रहने का भाव, साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार जगा देता है। यहां से पार जाना ही कठिन है।
उसके जगते ही यह जो दूसरा है, संसार है, वह उपस्थित हो जाता है। हो सकता है, साधक उपदेशक बन जाए, ऋषि महर्षि हो जाए, भगवान बन बैठे। संसार पर प्रभाव डालने की आकांक्षा बलवती हो जाती है। साधक अपनी विशिष्टता स्थापित करने के प्रयास में डूब जाता है। वह पुनः संसार के आकर्षण में लौट आता है।
तो फिर ?
जल का बर्फ हो जाना ही यहां साध्य है। सुख दुख, शांति से परे ”जो“ है वही साध्य है। यह सच है शांति बहुमूल्य है। पर अंत मे उससे भी परे जाना है। तभी ”जो“ है उसकी प्राप्ति संभव है। साध्य वही है। जो नित्य है, तथा जिसकी प्राप्ति से नित्य अभय और नित्य शांति प्राप्त होती है। यही धर्म का रहस्य है। जो धार्मिक है वह इसे पाने में समर्थ है। जिसकी प्राप्ति सहज हो, जो दूर नहीं जो विनाश युक्त न हो, तथा जिसमें आत्मीयता हो। जो इसी जीवन में, आज में अभी ही प्राप्त किया जा सकता है, वही साध्य है। साधन की सही समझ और विवेक के प्रति आदर भाव साध्य से अवश्य ही मिला देता है। जीवन आज में, अभी में, वर्तमान में ही जिया जाता है। वही साध्य उपस्थित है। विवेक का आदर होते ही मन की रूग्णता चली जाती है, जो दुख का कारण है।
हॉं, यह जो कल है,हमेशा स्मृति की कोटर से निकल कर आता है, वहीं वापिस लौट जाता है।स्मृति जननी है ,वह निरंतर विचारणा को सृजित करती रहती है।अवधारणा
ीभी वहीं जगह पाती है।यह वह ऐसा है, वह तो ऐसा ही है,विचारणा ,अवधारणा का आधार पाकर और पुख्ता होती जाती है।तब विचार बन जाता है। यही विचार मन का
 ही स्वरूप है। विचार जैसा होता है,मन वैसा ही होजाता है। विचारों का परिवर्तन ही   मौलिक परिवर्त्तन है।
विचार ही भय है, विचार ही घृणा है,विचार ही लोभ है,वही राक्षस भी बना सकता है,और निर्विचारता ही परमात्मा है,वहीं शक्ति है,वहीं शांति है।वह और कहीं दूर नहीं स्वयं के समीप है,जब यह जाना जाता है,तब जानने की जिज्ञासा में जो प्रयास अब तक किए थे तब उनकी अर्थहीनता का पता लगता है।
पूज्य स्वामी जी कहाकरते थे,‘ प्रयासों की आवश्यकता है ,यह जानने के लिए कि उनकी आवश्यकता नहीं रही है।’
शांत रहने के लिए ,शक्ति पाने के लिए आवश्यक है,हम मन के नियंत्रण के लिए,विचारों के नियंत्रण के लिए प्रयास करें।
यही आध्यात्म का मार्ग है,जिसका प्रवेश हमारे अंतः करण से ही होता है।







साधन का उपाय

”जो है“ उसी पर ही ध्यान केन्द्रित रहे यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहता है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर, मन और संसार सब बदल रहे है। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर में क्या अंतर है ? जो निरन्तर बदल रहा है वह सत्य नहीं। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है, उसी का ही चिंतन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह जो है उस पर जब ध्यान पहुंचता है तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान ”जो है“ उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है, वह मन है। तभी तो सारा ब्राह्यंड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान मनोनिग्रह का साधन कहा गया है।
प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यंत्र, रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान मात्र एकाग्रता नही है। एकाग्रता मन का बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मंत्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। एकाग्रता के बाद ही अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होती है। परन्तु एकाग्रता को ही साधन यात्रा स्वीकारने से साधक साधक पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा यह मंत्र यह नाम फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनः और अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान“ एकाग्रता नही है।
”ध्यान“ सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन का पथ  है,यह भी आंशिक सही है। हम जो भीतर है, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही सही विश्वसनीय पहचान हो,यहां ”ध्यान“ प्रक्रिया है। हम जो हैं एक स्थिर इकाई नही है। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आन्तरिकता नही है।
मन के संकल्प विकल्प की अनवरत श्रंृखला है। इसी श्रृंखला, इसी विचारणा का सतर्कता पूर्वक किया गया अवलोकन होना ,ध्यान  की प्रक्रिया हैै।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नहीं रखना है। बनी बनाई पूर्व निर्धारित कल्पना को क्या देखना । जो बात तय कर ली जाए, जैसे कोई नाम, कोई रूप उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही है, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर संपूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः  एक खालीपन एक गैप ,विचार और विचार के बीच में प्रदान करता है।
यह अंतराल  ही, यह खलीपन ही  साधना का एक पड़ाव है।
मन का आगे पीछे का चिंतन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह बेहोशी है, यह नींद है।
सच है हम जागते हुए भी सोए रहते है। कोई पूछे तो हमे लगता है, हम कहीं ओर थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधक स्वयं को प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलाएगा।
मन की गति असाधारण है। क्षण भर में ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती है। चित्र ही चित्र। न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे है। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम अपनी पूंजी मान बैठे है। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती है। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियां के साथ असहयोग करे तो संभव है कि मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है, न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पाऐंगे। जो कुछ है भीतर अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ उसे बाहर तो आने दे। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंद लाए जल को देखकर हम चौंक जाते हैं, और अस्वीकार करने लग जाते है। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते है। यह क्या है, यह तो पलायन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नही है। यह अज्ञान ही है। यहां हमारी जागरूकता यही है। कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम है हाजरी रहे।
छात्र कक्षा में आते हैं, बैठते हैं। पर जरा पूछो तो लगता है यहा थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान“ गायब होने का नाम नहीं, साक्षात अनुभवन है। जो कुछ है उसका विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्त्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नही है, हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन टूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञान रूपी कूड़ा कचरा जल कर राख हो जाता है। बंधन, वे पाश जिनसे हमने अपने आपको बांध रखा है, टूट जाते है। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते ही शेष रह जाता है, खुला आकाश निरभ्र और शांत जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रख कर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती है। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवद् इच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख दुख के झंझावत से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। यही भगवत्इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाए रखती है।
शास्त्रों में इसे ही योगमाया कहा जाता है। यही सोच मोक्ष अभिलाषा है यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा...... संसार से पलायन नही है।
यह संसार के प्रति सही संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आम्यंतरिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशांत रखता है, उसे दूर करने का है। इसलिए यहां व्यक्तित्व का संपूर्ण रूपान्तरण है। यहां आभ्यांतर तथा बाहय जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म को साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्मभाव से ऊपर उठ कर  आत्मानुभव ही नही हैं, परन्तु साथ ही उस परमात्मभाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहंी ओर भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल भी तो स्थिर नहीं रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितना गंदलाया, जल है। हमेशा निज को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्यों वहीं तो इसका रस है। जब तक उसे संसार से निराशा नहीं होती तब तक मन का अपना जो स्वरूप है वहां लौटना असंभव ही है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं है। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती है। ज्यों ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यो त्यों भगवत्कृपा के हम हकदार बनते चले जाते है। साथ ही जितनी भगवत कृपा हम पर होती रहेगी उतनी ही निम्न प्रकृति भी शुद्व होती रहेगी। यह साधारण नियम है। इसीलिए बर्हिजगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जाएगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन को छोड़ा ही छूटा है, और मन का ग्रहण किया चिपटा है।
चित्त शुद्वि और भगवत कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते है। यही साधन यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति उस विराट शांति की जिसके लिए हम इस अर्न्तयात्रा पर गतिशील है।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिस में जिस संसार की उपस्थिति है उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
कभी आचार्य ने कहा था। ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है। और साथ ही जगत ही ब्रह्म है।
यह तीसरा कथन अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही तो आध्यात्मिक यात्रा की उपलब्धि है। यह पूर्व कथनों की अवहेलना न कर उन्हें ही अधिक स्पष्ट कर रहा है। यही वह स्थिति है जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान अनासक्ति भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक ही नहीं रह जाते हैं, वरन् आचरण मे स्वतः ही आ जाते है। यही तो भगवतकर्म है। जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करती है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन् जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठकला है। अभिलाषाओं से सन्यास ही तो विक्षोभ का अंत है। यही तो मोक्ष है।
इसीलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है और साथ ही इस शरीर को भगवतकर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती है वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती है। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए मनोनिग्रह के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से विक्षोभ का अंत संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है तभी सकल त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां है। जन्म जन्म का संस्कार है।
स्थिरता के लिए वांछनीय है, इन स्मृतियों से असहयोग। साधक स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। अतीत के जो निष्कर्ष हैं, वे साधन पथ के चयन मे सहायक तो हैं पर मन का बार बार स्मृतियांे जाना तनाव ही लाता है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है। वह अशुभ ही अधिक है। दुखद है। वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी। जब तक यह ताला बंद है। मन का शांत भाव में आना असंभव ही है।
हर साधक प्रयोगशील है । उसे चाहिये अनंत धैर्य अनंत प्रतीक्षा। साधन के प्रति गहरा विश्वास। जब तक विश्वास नहीं होगा, सफलता नही मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगता पूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। यह एकाग्रता से प्रारम्भ होकर स्थिरता प्रदान करता है। निरन्तर सजगता पूर्वक की गई मन की निगरानी स्थिरता प्रदान अवश्य करेगी। यहां कोई दबाव नही है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाह्य आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन् जो जरूरी नही है उसको छोड़ना है इसी से ”जो“ है उस स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है, आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक हो, पश्चाताप नहीं करना है।  पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो संपूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः, ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। और उसमें जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ”जो“ जरूरी नही है, उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी हे।
जहां भी रहे जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहे। हम वहीं रहे उसी क्षण में रहे।
स्मृतियां तथा आकांक्षाओं मे जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिंदगी से पलायन नही है। वरन् जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है। यहां संसार को छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं कोई विचित्र वेशभूषा धार ण करनी है,संसार में रहते हुए ही अपनी सर्वोत्तम भूमिका प्राप्त करनी है।हम जहां भी हैं ,जो भी कार्य कर रहे हैं,उस कार्य को बेहतर करते हुए,वहीं जीवन में सुख एवं शांति पासकते हैं।
साधन मात्र है ,निरंतर वर्त्तमान में रहने का अधिक से अधिक से अधिक अभ्यास रखना।यहां किसी भी प्रकार के पलायन की कोई आवश्यकता नहीं है,जितना हम वर्त्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते जाएंगे उतना ही  जिसे छूटना है वह स्वतः छूटता चला जाता है।सुख इन्द्रियों के माध्यम से मन ही प्राप्त करता है,स्थायी सुख ही शांति की ओर लेजाता है।







साधन सूत्र
पर यह यात्रा सहज नही है। इसमें कई रूकावटें है। सुख लोलुपता भय सौंपती है। भय है, जिन चीजों में जिन वस्तुओं में, रूपों में, व्यक्तियों में मन उलझ गया है, रस लेता है, उनके छूट जाने का। सच तो यह है कि इस सुख लोलुपता के कारण व्यक्ति सारी उमर दुख झेलते हुए भी उसके कारण को समझ नहीं पाता है। समझ भी लेता है तो छोड़ने का प्रयत्न नहीं करता। इसके विपरीत वह भक्ति के नाम पर इस लोलुपता की मांग ही अधिक करता है।भक्ति प्रायः साधक को भटकाती ही रहती है,वह याचक बनता चला जाता है।
1. बुद्वि और विवेक में अंतर है। विवेक सत्यरूपी सूर्य की किरण है जो हमेशा सतपथ की ओर बढ़ने के लिए संकेत करती है। बुद्वि का आदर  होने से सांसारिक लाभ तो मिलता ही है, साथ ही स्वार्थभावना भी बढ़ती है।
बुद्वि लाभ -हानि अधिक सोचती है। यहां सत-असत का भेद नहीं है।
अतः विवेक का आदर होना चाहिए। साधक को जो जाना गया है, उसका आदर करना चाहिए। बु(ि से जब हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं,हम गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देते हैं।
2. विवेक का आदर होते ही, देहाभिमान टूटता है। शरीर भाव बहुत ही पुख्ता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी यह नहीं जाता। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का ही गुलाम हो जाता है। यह सूक्ष्म अंहकार है।यहां हम जो सही है उसके समीप आजाते हैं।हम अपने पुरूषार्थ से परिचित ही नहीं होते हें उसका सदुपयोग भी करने में समर्थ हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत में इस अवस्था का बहुत ही सुंदर वर्णन है गोपियां जो सबकुछ छोड़ आयी, वे भी यह सोच कर कि उन जैसा प्रेम और कहीं नहीं कृष्ण जो प्राप्त थे उन्हे ही खो देती है। और तो और वह विशेष गोपिका जिसके साथ उन्होंने आराधना की थी। वह भी इसी अहमभाव में डूब जाती है और जब पाती है कि कृष्ण उसे भी छोड़ गये हैं.. वह व्याकुल हो उठती है।
कृष्ण के पदचिन्हों को ढूंएती हुयी अन्य गोपियां जब वहां पहुंचती है तो वे भी उसे उदास पाती है।
यह सूक्ष्म अहमभाव साधना में विघ्न उपस्थित करता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी व्यक्तित्व का मोह बना रहता है। यही द्वैत है। दूसरे से अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना। दरअसल गुणों का संग्रह करने की भावना भी बाधा उपस्थित करती है। जब तक गुण की सत्ता है तभी तक दोष भी विधमान है। अतः साधक को चाहिए कि वह विवेक का आदर करे। मैं ओरों से श्रेष्ठ हूं यह अहमभाव साधक को वहां पहुंचा देता है जहां से यात्रा शुरू हुई है। अतः यह याद रहे, साधना का यह अर्थ नहीं है कि दोषों की अस्वीकृति के साथ ही गुणों को स्वीकारता चला जाये। यह गुणों की स्वीकृति एक मान्यता बना देती है उससे मोह हो जाता है। यह मोह अभिमान पैदा करता है, फिर साधक वहीं का वहीं रह जाता है।
3. साधक के लिये जैसा कहा, दो रास्ते हैं - पहला संसार की महत्ता उसे सौंपता है। दूसरा संसार को कर्त्तव्य भूमि बताते हुये उसे दासता से मुक्त करता है। सुखों की उपासना उसे गुलाम बनाती है। व्यक्ति अजाने सुख की लालसा में गुलाम रह जाता है। साथ ही कामना पूर्ति का अभाव उसे व्यथित कर देता है, तथा कामना पूर्ति का सुख उसे प्रसन्नता देता है। वह इसे ईश्वर कृपा कहता है और प्राप्त दुख को हटाने के लिए सद्गुरू तथा भगवान की शरण लेता है। वह दुखी होते हुए भी संसार की गुलामी नहीं छोड़ पाता है। अधिकांश इसी स्थिति में जीते हैं। कामना पूर्ति का लोभ उन्हें व्यथित बनाए रखता है।
इसीलिए साधक को चाहिए कि वह इस विघ्न को समझे। प्राप्त समझ का आदर करे। समझ ही उसे स्वाधीनता की ओर अग्रसित करेगी। वह कामना का स्वरूप समझ पाएगा तथा अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को सहज भाव से जी सकेगा। समत्व बुद्वि यही है। साधक के लिए कामनाओं का पूरा होना या न होना समान ही है। परिस्थितियां प्रारब्धवश होती है। प्रयत्न उनका चिंतन नहीं उनकी सहज स्वीकृति है। उन्हें जिया जाए......उनका चिंतन व्यर्थ है। फल जो भी हो उसे प्रारब्ध मानकर स्वीकारा जाए। फल से पलायन तथा विचलित होना साधक के लिए उचित नही है। परिस्थितियां साधक में विवेक जागृत करने के लिए आती हैं।
जो भी कर्म सामने उपस्थित हुआ हे मन को अधिक से अधिक वहीं रखना चाहिए,किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।कर्म की पूर्णता निश्चित ही पूर्णता का फल स्थाई शांति में सौंपने में समर्थ है।
4. कई बार ऐसा होता है कि हम प्राप्त परिस्थिति में सुधार की बात करते है। यह नहीं होता तो कितना अच्छा था, शायद इसके स्थान पर यह दूसरी नौकरी मिलती तो मैं बहुत खुश रहता, यह विकल्पों की यात्रा बड़ी लम्बी है। यही प्रमाद  है, यही भ्रम है।
हर परिस्थिति प्रभु का प्रसाद है। प्रारब्धवश प्राप्त है। वह साधन के लिए ही है। परिस्थितियों में जान बूझकर किया गया परिवर्तन सिलसिले को बढ़ाता ही है। हां, यह जरूर है कि हर परिस्थिति का सदुपयोग किया जाए। सदुपयोग से परिस्थिति का भोग समाप्त हो जाता है। सुख के सदुपयोग से, विनय प्राप्त होता है। यह मनुष्यत्व है। दुख का सदुपयोग वैराग्य सौंपता है।वस्तु के प्रति आसक्ति कम होने लगती है,साथ ही हमें अपनी सहनशीलता, कठिनाइयों में प्रसन्नता का अनुभव भी होता है।परिस्थितियों की निंदा,दूसरों पर दोषारोपण,उचित नहीं है।
परिस्थितियां जो भी प्राप्त है, वही हमारा वरण है। उनकी स्वीकृति ही जीवन का आदर है। प्राप्त का सदुपयोग और अप्राप्त का चिंतन छोड़ देना ही उचित है। इससे अभ्यास मे बहुत ही सहायता मिलती है। यह साधक को वह मंगलमल विधान सौंपता है जिससे कि उसका पारिवारिक जीवन ही मंगलमय हो जाता है। जहां भी हम रहें, होश में रहें। तो हर कार्य कुशलता के साथ तो होता ही है, साथ ही करने का भाव भी छूटने लगता है। प्रायः यह जो हम भविष्य पर टालते हैं कि आज नहीं कल करूंगा पहले यह हो जाए तब वह करूं, यह चिंतन साधक के लिए उचित नही है।
जो करना है, आज ही करना है।
साधन के लिए हिमालय की किसी कंदरा में नहीं जाना है। जहां भी रहंे, जिस समय रहे, वहीं से शुरू किया जा सकता है। साधन का अस्तित्व ही वर्तमान मे है। न वह स्मृति में है, न जीवेषण में। इस तरह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग ही साधन का लक्ष्य होना चाहिए।
बाह्य यह जो जगत है, इसमे जो मान अपमान है, आदर भाव है, अवहेलना है, साधन क्षेत्र में इसकी कोई उपयोगिता नहीं।इसे एक सीरियल की तरह लेना चाहिए,ज्यादा विचलित होने की जरूरत नहीं है।यह संसार गतिशील है, जो परिस्थिति आज है कल नहीं रहेगी।इसलिए बात-बात पर उत्तेजित होना ,अशांत होना उचित नहीं है।
हर प्राणी जो किसी भी स्थिति मे है वह अपनी योग्यतानुसार अपने विवेक का आदर कर साधन निश्चित कर साध्य को पाने के लिए स्वतंत्र है। क्योंकि लक्ष्य मात्र अध्ीिक से अधिक वर्त्तमान में रहना है।
5. हर साधक, साधन का यह अर्थ समझता है कि यह उसके भौतिक लाभ में सहायक होगा। यह सोचना ही गलत नहीं हैै। परन्तु भौतिक सुख के लिए आवश्यक है कि प्रयत्न किया जाए। प्रयत्न की सफलता भौतिक सुख देती है। जो भी प्रयत्न हो पूरी ताकत से किया जाए।मन की शक्तियां अधिक से अधिक वहीं रहें।
यह कहना है कि जो साधक है, वे इस जीवन मे धनी होंगे, स्वस्थ होंगे, वस्तुएं प्राप्त करेंगे, यह सोचना ही गलत नहीं है। क्योंकि साधक जब अपने विवेक का आदर कर अपने पुरूषार्थ का सदुपयोग करता है तब उसे भौतिक सुख जो उसके प्रारब्ध से उसे प्राप्त होने हैं ,वे तो प्राप्त होंगे ही कर्मो की श्रेष्ठता से यह अवधि बढ़ती भी चली जाती है।

6. सीखना एक अनवरत क्रिया है। साधक के लिए आवश्यक है कि वह सदैव प्रयोगशील रहे। प्रयोग का अंत कहीं नहीं है और न ही प्रयोग दूसरे के अनुभवों पर आधारित है। हर साधक का पथ उसको खुद की यात्रा ही नही है वरन् वही उसका प्रयोग है। अतः यह उसे कभी नहीं भूलना कि वह साधक है और प्रयोेगरत है। प्रयोग वही कर सकता है जो जगा हुआ है। सोया हुआ कभी कुछ जान नहीं सकता। अनुभव के लिए जागरूकता आवश्यक है। अतः साधक को अपनी मान्यता की कभी विस्मृति नहीं होनी चाहिए।
7. इस विस्मृति से ही साधक प्रायः अपनी साधन प्रणाली से मोहकर बैठते है। जैसे जप करने वाले जप को ही साधन मान लेते है। आसन लगाने वाले आसन को कभी छोड़ नहीं पाते। यह याद रखना चाहिये कि साधन सामग्री जो है वह प्रयोग की सामग्री है। हर सामग्री प्रयोग में सदा काम नहीं आती। जो कभी प्रारम्भ में काम आती है। वह कुछ ही समय बाद छूट जाती है। प्रयोग में मोह नहीं रहता। हां, साध्य के प्रति, कुतूहल रह जाता है। साधक प्रायः अपनी साधना की प्रणाली से इतना एकाकार हो जाता है कि वह अपने साध्य को ही भूल जाता है। उसे ही सबकुछ मान बैठता है। यह सबसे बड़ा विघ्न है। साथ ही प्रणाली के प्रति यह जो आसक्ति है वह अहं भाव पैदा करती है। साधक अपने साध्य को छोड़ कर साधन को ही सबकुछ मान लेता है। इससे वह साध्य से विचलित हो जाता है।
8. साधन यात्रा मे सबसे बड़ी कठिनाई, छोड़ने और छूटने की होती है। साधन उबाऊ और नीरस नही है। जो अपने साध्य के प्रति समर्पित है, वह कभी नीरस नहीं हो सकता। उसमें तो नित्य प्रियता रहती है।
इसीलिए छोड़ने और छूटने पर अधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये। अगर वर्तमान का आदर रहे, व्यर्थ के चिंतन में मन को नहीं जाने दिया जाये तो जो कुछ छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। हां, आवश्यक है कि विवेक का पूरी तरह आदर किया जाए, विवेक जन्य आचरण रखा जाए, जिसे छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। जो जाना गया है उसका पूर्ण आदर किया जाये तभी आचरण में शुद्वता रहती है।
पर होता विपरीत ही है। साधक और सिद्व भी जो जाना गया है अपने आचरण में उससे विपरीत रहते है। अहं सबसे बड़ा विघ्न है। साधक के लिए गुणी का आरोपण नहीं होना चाहिए। ऊपर से ओढ़ने के स्थान पर , विवेक का आदर और उसके अनुरूप आचरण ही पर्याप्त है।
9. साधक के लिए जो प्राप्त हो चुका है। प्रारब्धवश मिला है, वह उसके ही कृत संकल्पों का परिणाम है। यह जान लेना ही आवश्यक है। जो संबंध प्रारब्धवश बन गए हैं, माने गए हैं उनके प्रति कर्तव्य परायणता आवश्यक है। जो संबंधों को तोड़कर भगने को साधन मान बैठे हैं। वह कहीं भी लाभ नहीं ले सकते।
हां, जो संबंध हैं ? वहां अधिकार भावना के स्थान पर सेवा का भाव रखने से साधन में सफलता मिलती है। सेवक के लिए कर्त्तवय परायण होना आवश्यक है। जो हमारा है उसका ही हम त्याग कर सकते हैं, त्याग हम अपनी स्मृयिों का ही कर सकते हैं, वे ही हमारी संपत्ति हैं। वस्त्र बदलना ,घर छोड़ना, कोई त्याग नहीं है, घन की वस्त्रों की ,भोजन की आवश्यकता सभी को होती है,सन्यासियों की आवश्यकताएं गृहस्थों से अध्ीिक होती हैं।इसलिए त्यागी होना आवश्यक है। जोे निरंतर वर्त्तमान में रहना चाहता है वही त्यागी है। वैराग्य वस्त्रों का परिवर्त्तन नहीं है, अनावश्यक कल्पनाओं के बोझ को छोड़ते जाना ही वैराग्य है।साधक को चाहिए कि वह परमात्म भाव से  कर्त्तव्य कर्म करे, यही वास्तविक सेवा है। जो संबंध है, उनकी कर्तव्य भावना से पूर्ति करे।
10. साधक मे अपने साधन के प्रति अनन्य प्रेम, विश्वास जब तक नहीं होगा उसे सफलता नहीं मिलेगी। प्रायः साधक सारी उम्र साधन तलाश करते रहते हैं, जबकि साधन उनके ही पास उपलब्ध है। जो असाधन है उसका त्याग हो तो साधन है। पर वे भटकते रहते है। शास्त्रों का अध्ययन करते है तो वहां भी शंका करते है। सद्गुरू से मिलते है तो तार्किक बुद्वि ले आते है। गुरूवाणी मे तलाशते हैं कि यह शास्त्रों से कितना मेल खाता है। हर जगह वे संदेह से भरे रहते है। यह पहले ही कहा गया है कि रास्ते अलग अलग है मंजिल एक ही है।
हां, रास्ता चुनने से पहले खूब सोच लो, तर्क कर लो, पर जब समझ आ गई हो तो तब चलना ही श्रेयस्कर है। वहां वादविवाद होना, संदेह होना लाभप्रद नही है।एक ही सफलता का सूत्रा है जो भी हम कहें ,जोभी हम करें उसके प्रति हमारे भीतर पूर्ण विश्वास हो।
11. साधन यात्रा में सबसे बड़ी कठिनाई, साधन के चयन की है। साधन का यचन अपनी योग्यता तथा आवश्यकतानुसार होना चाहिए। हर साधक अपनी मांग को अवश्य जानता है। फिर भी अगर निर्णय लेने में परेशानी हो, असुविधा हो तो सदगुरू की शरण में जाना चाहिए।
शिक्षक और सद्गुरू में भेद है।
शिक्षक जानकारी देगा। शास्त्र वचनों के आधार पर साधक को समझाएगा पर सद्गुरू निजी अनुभव के आलोक में साधक के विवेक को जागृत करेगा।
विवेक अलौकिक है। वह एकाग्रता का फल है।
सद्गुरू पर पूर्ण विश्वास करके उसके आदेशों को स्वीकार करना चाहिए। साथ ही अन्य साधकों से न तो अपनी तुलना करनी चाहिए और न ही उनका अनुकरण करना चाहिए। सब अपनी योग्यतानुसार बढ़ते है।
जिस प्रकार एक ही रोग की एक ही दवा तथा एक ही पथ्य होते हुए भी रोग की अवस्थानुसार रोगियों को अलग अलग मात्राऐं दी जाती है, वही स्थिति साधन प्रणाली की है। हर साधन हरेक के लिए आवश्यक नही है।
12. साधन यात्रा मे कई पड़ाव आते है। साधक प्रायः एक दूसरे को देखकर मन में कई बार हीनता का भाव ले आत है। इसलिए प्रायः साधन को प्रायः गुप्त रखने के लिए कहा जाता है प्रायः जो अतिरिक्त अनुभूतियां हैं वे एक दूसरे की समान नहीं हो।
उदाहरण के लिए एकाग्रता कर अंतिम अवस्था में कई बार साधको को प्रकाशपुंजों का जो कि बैंगनी रंग के होेेेेेेेेते है दर्शन होते हैं, किसी किसी की यह न हो कर अनवरत ध्वनियां सुनाई देती है, प्रारम्भ में ये बहुत तीव्र होती है साधक डर जाता है, वह कान मे दवाई डालने लग जाता है किसी की सूक्ष्म नाद, झींगुर की तरह या घुंघरू की तरह सुनाई देता है। नाद की कई अवस्थाएं है। परन्तु सच तो यह है कि हर साधक के अनुभव दूसरे से पृथक है।
यही स्थिति स्वप्न और ”विजन“ की है। स्वप्न और ”विजन“ में अंतर है। विजन स्थाई सा रहता है। आंख खोले रखने पर भी उसकी प्रतीती होती है। पर ये विजन तथा स्वप्न हर साधक की स्थितियों के आधार पर अलग अलग होते है।
प्रायः साधक यहां अनुकरण शुरू कर देते है। इस बारे मंे कई बार जो         धारणाएं बन जाती है। उन्हें ही वे पाने का प्रयास करते है।
साधक अपनी साधन यात्रा से विचलित हो जाता है।
13. साथ ही साधको की भी अवस्थाएं है। उनकी मानसिक अवस्था के आधार पर उनके भेद हैं । कुछ हैं जो अपने दोषों से, अपने दुख से इतने व्याकुल हैं कि वे निर्दोषिता प्राप्त करने के लिए चल दिए है। उनका हर पल साधन को समर्पित है।
कुछ साधक है, समझते भी हैं। समझ का आदर भी करते हैं, पर सुख लोलुपता छोड़ नहीं  पाते है। से साधन मे स्थिर नहीं रह पाते और तो और वे अपने दुख का कारण अपने से बाहर तलाशते हुए उसके रूपांतरण का प्रयास भी करते है। वे जानते हुए भी आचरण में अपनी समझ को नहीं ला पाते। कहते हैं, समझ तो गया परन्तु अभी इसके लिए समय नही है। उन्हें दोष पता तो है परन्तु अभी व्याकुलता बढ़ी नही है कि वे बदलने के लिए प्रयास करें।
इसलिए सद्गुरू सत्संग और सद्गुरू की शरण एक मात्र आधार है।
सत्संग से आत्म प्रशंसा रूकती है और निज का दोष दर्शन शुरू होता है। वह समझ का आदर करने लगता है।
सदगुरू की आज्ञा मानते ही विनय प्राप्त होता है। विनय ही विवेका की तरफ ले जाता है। विनय ही अंहकार को तोड़ता है। अंहकार ही अविद्याा का जनक है। इसलिए विनय महत्वपूर्ण है। विनय अलौकिक है। विनय ही विाद्या प्रदान करता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है।
सर्वाधिक संख्या उनकी है जो विवेक का महत्व समझते तो है परन्तु अपने आपको इस दुख से इस दोष से, बाहर आने में असमर्थ मान लेते है। वे संसार की भागदौड़ में उलझ कर ही रह जाते है। यहां, बुढ़ापा ही भगवान के भजन के लिए छोड़ दिया गया है। इनके लिए वर्तमान में तो समय है ही नहीं। ये सब उधार की जिंदगी जी रहे है। उनके लिए खुद के लिए एक मिनट भी नही है। वे जीवेषणा में जीवित है। वे भविष्योन्मुखी है। कल में ही वे सबकुछ करना चाहते है। ये लोग सद्गुरू के पास भी जाते हैं तो भौतिक सुख को कामना ही शेष रहती है।
इनसे भी नीची अवस्था उनकी होती है जो प्राप्त समझ का दुरूपयोग करते है। ये आध्यात्मिक जानकारी को पेट भरने का धंधा बना लेते है। ये आध्यात्मिक सूचनाएं बेचते हैं। धन ही इनका लक्ष्य रहता है। ये स्वयं साधन यात्रा पर न होते हुए भी साधन की चर्चा सर्वाधिक करते हैं इन ज्ञान बंधुओं को साधन का लाभ कभी प्राप्त नहीं होता है।यह आवश्यक नहीं है घर वापिस पहुंचने के बाद वापसी इसी रूप में हो,इन परिस्थिितियों से भी बदतर स्थ्तिि में लौटना हो सकता है।यह जीवन अत्यध्ीिक महत्वपूर्ण है।सार्म्थ्य का सदुपयोग ही सार तत्व है।
14. हर साधक को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि साधन यात्रा में आत्म प्रशंसा ही शत्रु है मन जो हीन भावना से ग्रस्त रहता है वह स्वयं ही अपनी प्रशंसा में लिप्त हो जाता है।
क्यों ?
यहां भी तो संतोष मिलता है। पर आत्म प्रशंसा व्यक्ति के विकास में     बाधक है। वह कभी आपको अपने आपसे संलग्न नहीं कर पाती। दूर ही रखती है।
आत्म प्रशंसा-आत्मनिरीक्षण में बाधक है। जब हम अपने दोषों से जी चुराना चाहते है। तभी आत्म प्रशंसा में डूबते है। खोलखलापन जो है, वहां गूंज जोरों से होती है। ओर जो दोष है, वे उसी रूप में विधमान रहते है। अगर देखनी है तो अपनी बुराई देखिए।
15. दूसरों के दोष देखने से निज का अंहभाव दृढ़ ही होता है। आत्मनिरीक्षण रूक जाता है। साधन पथ में यह सर्वथा अहितकर है। पर दोष चिंतन में मन असाधारण गतिशील होता है उसे रस मिलता है। निंदा स्तुति ही प्रायः मनुष्य की पहचान हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह इससे बेचे।
परदोष चिंतन और आत्मप्रशंसा का मुख्य कारण है,
वाचालता।
हमें कुछ ना कुछ बोलने की आदत ही हो गई है। साधन यात्रा में अगर संयम करना ही है तो वाकसंयम आवश्यक है।
जब साधक निरन्तर बोलता है, तब दो ही रास्ते बने हैं -
1. आत्म प्रशंसा 2. परदोष दर्शन।
इससे मन और अधिक विक्षोभ में डूबता है। तनाव रहता है।
साधन में यह बाधक है।
16. वाचालता का प्रमुख कारण स्मृति है।
स्मृतियां ही व्यर्थ का चिंतन करती है।
मन जब व्यर्थ का चिंतन करता है तब आवश्यक संकल्पों की पूर्ति नहीं हो पाती। कर्म  तभी सफल हो पाता है जब अनावश्यक विचारणा का दबाब नहीं होता है। यहीं कर्म कर्तव्य बुद्वि से जन्य होकर सार्थकता देने में सफल होता है।
यह व्यर्थ का चिंतन होता है, स्मृतियों में रस लेने से । स्मृतियां ही तो अचेतन मन में संग्रहित है। उनके साथ असहयोग होते ही उनकी अर्थवत्ता समाप्त हो जाती है वर्तमान में रहने की यही कला है कि स्मृतियों के साथ सहयोग न किया जाये। तभी आगे पीछे का व्यर्थ चिंतन रोका जा सकता है।
स्मृतियों का दबाब कम से कम होता जाए इसके लिए आवश्यक है:-
1 आप शांत होकर बैठें संकल्प लें आप किसी से भी नाराज नहीं हैं,जिनके प्रति नाराजगी है ,उन्हें याद करें ,उन्हें अपने अंतः करण से क्षमा करदंे।जिस को भी आप अपना इष्अ मानते हैं कल्पना करें वे आपके साक्षी हैं।
2 जो आप से नाराज हैं,उनको याद कर उनसे भीष्ष्क्षमा मांगें।
दस दिन बाद आप पाएंगे आपके विचार भी कम होने लग गए हैं
विचारों के कम होते ही विकारों का कम होजाना स्वाभाविक है।इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है।



















साधन क्रम
साधन पथ रूपी त्रिभुज को अभ्यास, सत्संग और स्वाध्याय ये तीन भुजाएं है। जो साधन यात्रा की संपूर्णता देती है। स्वाध्याय सत्संग के लिए प्रेरित करता है और सत्संग अभ्यास के लिए तभी साधक संपूर्णता पाता है।
यह शास्त्रानुसार प्रदर्शित मार्ग है।
स्वाध्याय
स्वाध्याय ही सामान्य व्यक्ति को साधन पथ सौंपता है। स्वाध्याय जीवन में नियमित रहना चाहिए। मन की स्थिरता के लिए और पथ की तलाश के लिए आवश्यक है कि सद्ग्रन्थों का नियमित अययन होता रहे।
स्वाध्याय - स्व का अध्ययन है। यह हमें आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाता है। इसलिए स्वाध्याय का अर्थ मात्र शास्त्र अध्ययन से नही है।
अगर जीवन में सद्गुरू प्राप्त न हो तो, साधन यात्रा में सद्ग्रन्थों को ही सद्गुरू मान कर उनके आधार पर साधन की समस्याओं को हल करना चाहिए।
वैसे सद्गुरू के द्वारा बताए गए सद्ग्रन्थ ही उपयोगी होते है। वे रोगी के रोग को देखकर ही दवा देते है। अन्यथा पुस्तकालय तो दवाई की दुकानों की तरह होता है।
ग्रन्थों को समझ के लिए भी पर्याप्त समझ चाहिए। अंधों के लिए जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश व्यर्थ है उसी प्रकार सद्ग्रन्थों का अध्ययन विवेक के प्रकाश में ही होता है।
अतः साधको को चाहिए कि गुरू आज्ञा से ही वह स्वाध्याय मे रत रहे। ये ग्रन्थ मनोरंजन के लिए नही है। साधन ग्रन्थ पहले सद्गुरू दिया करते थे। अब छापे खाने हो गये है। सभी तरह के ग्रन्थ उपलब्ध है। अतः अनर्थ अधिक हो गया है। साधन सूत्र यहां रूपक कथाओं में हैं।प्राप्त विवेक का आदर हमारे व्यवहार को बदलने में सहायक होता है। जो सही है, और सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है ,वही विवेक है।
सत्संग -
सत्संग और सद्चर्चा मे अंतर है। असत का त्याग होने पर सत्संग अपने आप हो जाता है। प्रायः सत्संग के नाम पर जब हम एकत्रित होते हैं, गपशप ही अधिक करते है। बातें करते हैं। कहा करते हैं हम सत्संग में गए थे। जब तक भीतर से परिवर्तन न हो, और आप खुद न करना चाहे, सत्संग आप नहीं कर सकते।
अभ्यास और सत्संग विवेक के ही दो पहलू है। अभ्यास ही सत्संग है और सत्संग ही अभ्यास है। इसीलिए जहां तक हो सके सद्चर्चाओं के स्थान पर सत्संग ही किया जाना चाहिए।
आत्मनिरीक्षण ही व्यक्तिगत सत्संग है। यहां साधक को ”जो है“ साक्षात्कार, अनुभवन का अभ्यास करना है। परन्तु साधक को आंतरिक गहरे मौन में स्मृतियां पास नही रहने देती। मूक सत्संग में सबसे बड़ी बाधा यही है। इन स्मृतियों के असहयोग से संबंध विच्छेद से इनसे बचा जा सकता है। संबंध समाप्त होते ही इनकी सत्ता समाप्त हो जाती है। फिर इनका प्रभाव नहीं पड़ता है। परन्तु यह होना सहज और सरल नही है।
जब साधक अपने एकांत सत्संग मे प्रवेश करने मे पने आपको असफल समझता है। तब उसे चाहिए कि उन कुछ लोगों को जिन्हें साधन में रूचि है। समान भाव है। उसे साथ बैठना चाहिए।
यह सामूहिक अभ्यास भी लाभकारी है।
परन्तु यहां पर दोष चिंतन के स्थान पर निज के दोषों की चर्चा करनी चाहिए। उन्हें दूर करने के उपाय तलाश करने चाहिए।
सत्संग का अर्थ भजन कीर्तन नही है। न ही शास्त्र श्रवण है। परन्तु बहुत गहरे में अपने ”सत“ से युक्त होना है। इस तकनीक को जिसने समझा है वही साधन यात्रा का लाभ ले पाया है। क्यांेकि यात्रा में कई पड़ाव आते है। कोई साधक आगे, कोई साधक पीछे रहता है। कई समस्याएं सभी को एक जैसी पार करनी पड़ती है। जहां पर भी जिस साधक ने अपनी समस्याओं को जिस प्रकार दूर किया है, समाधान जानना लाभकारी रहता है।
साधन यात्रा अनवरत प्रयोग है। जब तक परिणाम प्राप्त न हो तब तक प्रयोग नही छूटता है।
अतः सत्संग को श्रेष्ठ साधन समझकर ग्रहण करना चाहिए।
इस जीवन मे कभी कभी ऐसा होता है जो सत है, जो जीवन मुक्त है, उनकी कृपा दृष्टि भी हो जाती है।
यदि साधक स्वयं अपनी जिज्ञासाओं के समाधान मे असफलता पा रहा है, उसे कुछ पूछना शेष रह गया हो, जानना शेष रह गया हो। वह पाता है कि उसके विक्षोभ को वह दूर नही कर पा रहा है बैचेनी है। तो फिर किसी सद्गुरू की शरण में जाना चाहिए।
सद्गुरू की पहले खूब जांच पड़ताल रखनी चाहिए। बुद्वि लाभ, लोभ की दासी अवश्य है, पर वह बारीकी से जांच पड़ताल करने मे समर्थ है। जिसमें अपने जानते हुए किसी प्रकार का दोष नहीं दिखता हो। जिसके सम्मुख अंहकार झुकना  चाहता हो। क्योंकि मन का स्वभाव यही है कि वह अपने से बड़े के सम्मुख श्रेष्ठ के सम्मुख स्वतः ही झुक जाता है।
यह समर्पण जो है, अस्वाभाविक नही है। यहां सम्मुख होते ही शांति की लहरों में साधक अपने आप को पाता है।
शांत सरोवर जिस प्रकार अपने संसर्ग से चित्त की बैचेनी दूर कर देता है उसी प्रकार संतो के प्रेमिल चित्त साधक के मन में प्रेम की धाराएं उत्पन्ना कर देते है। यह उनके संसर्ग का ही परिणाम है कि अपने भीतर गहरी शांति अनुभव करता है।
परन्तु यह ध्यान रहे, यहां तर्क नहीं, शंका नहीं। वरण का अधिकार एक बार का ही है।
पर होता विपरीत है।
साधक की सद्गुरू के प्रति श्रर्द्वा नहीं होती। वह वहां भी सांसारिक लाभ के लिए जाता है। व्यर्थ की चर्चाएं करता है।
साथ ही वह जैसे कपड़े बदलता है, वैसे ही वह गुरू बदल लेता है।
परिणाम यह रहता है कि वह लाभ नहींले पाता है। उसके भीतर परिवर्तन नही आता है।
सद्गुरू मनोरंजन नहीं करते। वे अनुभव के स्त्रोत है। साधक के अनुभवन को जागृत करते हैं, पर आवश्यक है कि उनके परामर्श पर अमल किया जाए।
अभ्यास:-
अपने  आप से संसार को हटा लेना ही अभ्यास है। यह सब एक ही दिन एक ही क्षण में तो नहीं होने वाला है, परन्तु निरन्तर अभ्यास से ही इसे पा अवश्य सकते है। संसार संकल्प रूप ही है। इच्छा कि उत्पत्ति ही दुख है। उसकी पूर्ति सुख है, और इच्छाएं अनन्त है, अतः हर इच्छा की पूर्ति असंभव ही है। परिणामतः दुख ही दुख है। अतः इच्छा की निवृत्ति ही आनन्द है। यही पूर्णता मिलती है। संसार की सहायता से पूर्णता नहीं मिलती है। यह संसार हर क्षण और अभाव बढ़ा सकता है। गरीबी दे सकता है। और जो अभाव में है  उसका चित्त कभी शांत नहीं हो सकता।
साधक को चाहिए कि वह क्षण को जो उनके सामने उपस्थित है, सार्थकता प्रदान करे। यह सार्थकता उस क्षण को अनुभव में बदल कर हम पा सकते हैं अनुभव के लिए वर्तमान मे रहना होगा। आगे पीछे भटकना, मन का भूत और भविष्य में हो रहा संक्रमण हमें रोकना चाहिए। यह भटकाव हमारी शक्तियों को विघटित करता है। मन जितना अतीत और भविष्य के भटकाव से पृथक होगा, उतनी ही वह सार्थकता प्राप्त कर सकेगा। भगवत कर्म से युक्त होने का यही सार्थक प्रयत्न है।
इसीलिए जिन चीीजों को अपने अंदर रख रखा है, उन्हें धीरे धीरे हटाते चले जाना ही यहां अभ्यास है। मन संकल्प रूप है, उसकी अशुद्वि दो प्रकार की है। एक तो वह चंचल है, दूसरा वह मलिन है। मलिनता और चंचलता, स्थिरता पाते ही दूर होती है। जितनी अधिक स्थिरता प्राप्त हो जाएगी, विवेक ओर स्पर्श से मलिनता भी दूर हो जाएगी, और कर्म, भगवत कर्म में रूपांतरित होता चला जाएगा।
इसीलिए साधक के लिए आवश्यक है, वह आत्मरिीक्षण की ओर बढ़े।
आत्म निरीक्षण
ध्यान योगी के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिकता में विचरण करे। मनोजगत मे पेठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे है। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है परन्तु यहां पर किसी और अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण औश्र दोष को ही जीवन मान बैठे है। जीवन जो है, जिस रूप मे है। उसके मूल यप को जान ही नहीं पाते।
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है..........यह मुझे दूर करना है तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विधमान है। राग द्वेष को समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना, बस इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नहीं करना है, ब्राह्य से लाकर कुद आरोपित नहीं करना है जो है उसका सतर्कता पूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई संकल्प नही है रूपांतरण की चाहत भी नही है तभी तो जो है उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान मे रूपान्तरण को क्रिया शुरू हो जाती है तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द्व, यह ध्यान नही है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर.............मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नहीं। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति भावना नहीं, जो है उसे ही निःसंकल्पता से देखना है, बस नाव चलती रहे चलती रहे तभी यह अर्न्तयात्रा संभव है। यह निःसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचरणा का अवलोकन हो यह हमें प्रदान करता है।
इसीलिए आवश्यक है काल के इस अमूल्य क्षण मे मन अत्यधिक संवेदनशील हो, औश्र यह तभी संभव है, कि विचारणा ही नहीं रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभवकर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है अनुभव और अनुभवकर्ता पृथक हो जाते हैं इसीलिए हम पाते हैं हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते है। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य मे मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है निःसंकल्पता, एक गहरा मौन यही तो हमारा         ध्येय है।
ध्यान योग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा भागवत भाव की प्राप्ति होती है, वही जीवन भगवत कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है यहां है सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं ?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भागवत इच्छा ही प्राणों की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अंत में जाकर यह भी परमात्मा मे विलीन हो जाती है। अतः प्रयत्न यहंा निंदनीय नही है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही हे।
ध्यान भोग का अभ्यास ही सर्वाधिक उपयोगी है।
इसीलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए उन विचारों को जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दे। बिना काम के विचार वे ही हैं जो कभी वर्तमान मे नहीं रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते है। यही तो चिन्ता है, जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्गजगत मे हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके मन एक क्षण में लाखांे मील की दूरी लांघ जाता है। ओर जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐंगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग करना लक्ष्य नही है हम चाहते हैं, उसका बर्फ बनाना जिससे कि फिर कभी र्कोइ लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही और नहीं अबतक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमें, अविचार से हटाते हुए उस संकल्पहीनता को सौंपता हैं जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत कर्म है यहीहमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं।
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर समय नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते है। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है तभी तक दुख है। पर न जाने कैसा भटकाव है। प्राणी दुख भागता हुआ भी सुख की भूल भुलैया में इतना उलझा रहता है...............तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्वियों की तलाश में हठयोग में, या सुख की कामना मे ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है , गुरू डम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन मे शास्त्रानुसार बताए मार्ग पर चलकर अभ्यास सत्संग और स्वाध्याय द्वाा ध्येय पाना ही है। ध्यान योग ही सहज और सुगम वह मार्ग है जो संतो का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो प्रयत्न आज से और अभी से ही किया जाए।
पहला कदम:-
जरूरी नहीं कि एक दिन एक ही क्षण में चमत्कार हो जाये। योग मार्ग पीपिलिका मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुयी वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुंच जाती है, वही भाव साधक के मन मे होना चाहिए। कम से कम दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना चाहिए। सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो  लेटे ही रहे। देखे मन क्या कर रहा, सतर्कता से आंतरिक विचारण का अवलोकन करे न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम मे है और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया समझाइये अभी तो विश्राम मे हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू शुरू मे मन नहीं मानेगा फिर ज्यों ज्यों अभ्यास बढ़ता जाएगा वह नियंत्रित होता चला जाएगा।   साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिये यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइये। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वांछा कर रहा है। उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के ओर रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिये। मन ही मन की निगरानी कर जब थक जाती हो तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का यह अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम:-
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाह्य नाम रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्राह्यनाद पर ही मन को स्थिर किया जाये। मन जब ठहरता है, तब अर्न्तजगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती है। संतो ने इनके कई रूप बतलाए हैं ज्यों ज्यों मन ठहरता जाता है, यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे कुछ भी करता रहे मन यहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा मे जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज जीभ है। स्वाद की   परिधि मे भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है।  क्योंकि इसके दो कार्य हैं, जब वह बाहर  आती है तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष दर्शन में लग जाती है। पर निंदा या चाटुकारी साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है वह बहरा भी होता है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन का परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते है तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते है। जब तक दोष दर्शन और पर निंदा उवाच जारी है हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नही सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसंधान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम की करना है।
अंत में:-
साधन यात्रा का प्रारम्भ ही एकाग्रता से होता है। अशुभ संकल्प जैसे जैसे मन वर्तमान मे रहना शुरू करता है, दूर होने लग जाते है।
स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।
अशुद्व और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।
यह वह स्थिति है जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद जो कल तक संगी था कहीं दूर चला गया है।
साथ ही अशुद्व संकल्प जो पर निंदा तथा पर अहित मे थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।
साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कर्तव्य परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुद्रिता, प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम आंतरिक है।
साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से, तनाव से भरा हुआ था। खाली हो गया है। वह गहरी शांति का अनुभव करता है।
साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे। वे भी बदल रहे है। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।
वह कर्तव्य कर्म से जुड़ता है।
कर्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं, स्वतः ही कम होने लगते है।
व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी विचारणा बढ़ जाती है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।
ओर भी आगे अगर साधन यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है ज्यों ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती जाती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन हो जाती है।
सघन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था वह स्वतः छूटता जा रहा है। जो पाना था। वह सवतः प्राप्त हो रहा है।
और भी आगे साधक को इस शांति से भी अलग होना पड़ता है। निरन्तर विचरण से साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार पुनः आकार ग्रहण कर लेता है। मैं श्रेष्ठ हूं। मैं शांत हूं। मैं जो था वह पुनः ताकतवर हो जाता है।
साधक गुणों के अभिमान में डूब जाता है। वहां से भी आगे बढ़ता होगा।
साधन यात्रा में यह पड़ाव है।
इसमे रहते हुए और आगे बढ़ना है।
बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही है। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते है।
सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।
आगे और आगे जो साधन यात्रा का पड़ाव है।
”जो“ है, स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे मे कुछ कहा नहीं जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारण के क्षेत्र में आता है तब भाषा भी उसे प्रकट करने मे असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नही है।
यह हर साधक का अधिकार है। स्वतंत्रता हर साधक का जन्म सिद्व       अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।
साधन यात्रा प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। अनवरत है। यहां प्रारम्भ तो दिखता है पर अंत नहीं। इसीलिए अनन्त धैर्य ओर अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।


सेवा प्रतिष्ठान
पोस्ट गुरूकुल जिला झालावाड़ ;राज0
-ःसर्वे भवन्तु सुखिनः-
निःस्वार्थ भाव से समाज सेवा करने  तथा अन्य समाज सेवी सज्जनों को समाज सेवा का सुअवसर प्रदान करने के शुभ संकल्पों से प्रेरित होकर इस क्षेत्र के आध्यात्म प्रेमी सज्जनों द्वारा गुरूकुल के प्रांगण में सेवा प्रतिष्ठान की स्थापना की है। सेवा कार्य सुचारू रूप से चलाने हेतु आजीवन तथा सहयोगी सदस्य बनाये जावें ऐसी प्रबंध समिति के सदस्यों की कामना है। प्रतिष्ठान द्वारा किये जाने वाले सेवा कार्यो का त्रेमासिक विवरण प्रत्येक सदस्य के पास भेजा जावेगा। अतः आध्यात्म प्रेमी एवं समाज सेवी सज्जनों से नम्र निवेदन है कि इस शुभ अवसर का लाा उठाकर मानव सेवा द्वारा परमपिता परमात्मा की सेवा के पवित्र कार्य में अपना सहयोग प्रदान करें।


निवेदक
प्रबंधक समितिसेवा प्रतिष्ठान