मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

yade4

यादें 4

मित्र ने कहा है ”,पुरानी बातों को भूल जाओ। सही है , जो हो चुका , वह होचुका , जो होगा देखा जाएगा। सही है।“


पर जो घटनाओं से परे है, जहॉं मात्र अनुभवन जगा था , वे ज्योतित क्षण, तथ्य नहीं होते। घटनाएॅं , नहीं बनते।
हम बरसों तक सदगुरु के साथ रहते हैं ,  उनके सानिध्य ूें वर्षों रहते हैं।  पर हम काष्ठवत हीी जीवन जी लेते हैं , पर जैसे गए थे , वैसे ही लौट आते हे। क्यों? जिस बुद्धि को मित्र मानते हैं , वही कहीं नमनीय नहीं होने देती।हमारी बुद्धि की तीव्रता अधिक से अधिक हमें ज्ञान बन्धु ही बना देती है। बचपन में जो कमाई साथ लाते हैं , बुढत्रापे में वह गंवय कर और उधार की पोटली बॉंधकर ले जाते  हैं।
कुछ बाते हैं , जो मित्रों के साथ साझा करने से अपना ही परिष्कार हो जाता हैं।

बात पुरानी है। तब गुरुकुल में बहुत कम लोग आते थेे। परंपरागत आश्रम जैसा वैसा कुछ वहॉं नहीं था। एक साधारण गैरिक वसन धारी संत के प्रति जो जिज्ञासा का भाव होता है , बस उससे कुछ अधिक था। स्वामीजी आध्यात्मिक चर्चाओं से बहुत दूर थे। हमारे सवाल प्रायः धर्म ग्रंथों के आधार पर होते थे वहॉं स्वामीजी चुप ही रहते थे।
गुरुकुल सरकार को सौंप दिया था। सुबह सरकारी स्कूल चलता था।  फिर दिन भर गहरी शांति रहती थी।
हमारे पास क्या था , तब पता नहीं , एक अदृष्य खिंचाव था। बस जैसे पूर्वनिर्धारित रहा हो। तब पहली बार सवाल पूछना शुरु किया था। स्वामीजी ने कृष्णमूर्ति की पुस्तक ”फ्रीडम फ्रोाम नोन “ मंगाकर पढ़ने का दी थी। वे जिस शिक्षण की ओर ले जारहे थे , तब उसका भान नहीं था।

उन दिनो , डाह्या भाई , मूलचंदजी , पोस्टमास्टर कन्हैयालाल जी से परिचय हुआ था। तब स्वामीजी के साथ भवानीमंडी जाना हुआ। कन्हैयालाल जी ओशो के सत्संग में हो आए थे। वे वहॉं से पुस्तकें साथ लाए थे।
एक दिन तब मैं भी गुरुकुल में था। ये तीनो आसन प्राणायाम पर बहुत जोर देते थे। मूलचंदजी के गुरु हरिद्वार में थे। स्वामीजी  कभी किसी को अपनी ओर से कोई सलाह नहीं देते थे।

वे उस दिन अपनी नियमित दिनचर्या के बाद कुटिया में आए , उन्होंने प्रणाम किया।  स्वामीजी ने कहा बैठ जाओ।
पोस्टमास्टर साहब ने हॅंसकर कहा स्वामीजी बैठ गए है।
स्वामीजी हॅंसे , अभी बैठे कहॉं हैं?
व्ेो चौंके , फिर बोले हम सब बैठे हैं , स्वामीजी।
”स्वामीजी हॅंसे , फिर उनकी ओर देखा , आपके पॉंव लगातार हिल क्यों रहे हैं? क्या कोई बीमारी है , या आपका मन कहीं बाहर भटक रहा है?
वे अवाक रह गए।”स्वामीजी आपने सही कहा, हम सब आज सलावद ( पास का गॉंव )  जाने की सोच रहे हैं।“
”तो हो आओ।“
तब मूलचंदजी ने बात संभाली , ”स्वामीजी कन्हैयालालजी बंबई से किताबें , लाए हे। ओशो ने कहा हे , वर्तमान में रहो, आप भी यही कहते हैं, कैसे रहा जाए?
तब स्वामीजी हॅंसे , बोले , जिन्होंने कहा है , वहॉं गए तो उनसे पूछ कर आते।
वे सकपकाए , ”स्साब वहॉं कहॉं पूछना , बस दूर से उनको देख लिया था।“
स्वामीजी फिर हॅंसे , उसी सवाल का उत्तर ही तो मैं दे रहा था।

आज वर्षों के बाद यही उत्तर हाथ आया है , सद्गुरु का सानिध्य ही सत्संग है। वे हर क्षण सिखा जाते है। बुद्धि ही बाधक रही जो , सवाल पर सवाल पूछती रही। ”जहॉं हैं , बस वहीं पूरे सौ टका हो जाएॅं ,शरीर मन प्राण की एक रसता ही तो वर्तमान है।  तभी हृदय का द्वार खुल जाता है।

शायउ चुप रहने की कला तब मिल जाती , तब सदगुरु के शब्द नहीं उनके हृदय से ही हम जुड़ जाते , पुरानी कहानी है , स्वप्न में परमात्मा ने कहा मैं सुबह आउंगा , पर तभी  नींद ने कहा यह तो सपना है , सुबह उठकर देखा , घर के बाहर किसी के आगमन की सूचना थी , उसके पांवों के निशान थे , वह तो आया भी और चला भी गया , पर हम मूढ़ता में ,अपने ही अज्ञान की गहरी नींद में सोते ही रह गए।


नरेन्द्र नाथ


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