मित्र
जन्म से जो साथ आया है, तथा मृत्यु तक जो साथ रहता है, वही तो मित्र है।
मन तो रहता हुआ भी, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ भटकता रहता है, भटकाता है।
इस मन की मित्रता के लिए सभी संत, महात्मा परेशान रहे हैं।
सूरदास जी कह गए,”ऊधो मन नाही दस बीस, जब एक से ही परेशान थे, तब दस
होते क्या होता?
संत कबीर तो गाली तक दे गए , कृष्ण की पूरी गीता इसी कंपायमान चित्त को स्थिर
करने की कला ही है। पर जो सदियों से प्रवचन देते रहे, वही सबसे अधिक अशांत रहे।
बुद्ध, महावीर , नानक , गोरख सभी इसकी मित्रता के लिए उपाय बताते रहे।
राजयोग की पाठशालाएॅं इसी मन की एकाग्रता का पाठ पढ़ा रहीं हैं। पर यह मन है, यह कहीं किसी के
नियंत्रण में आते नहीं देखा।
भगवान रामचंद्रजी जानते हुए भी स्वर्णमृग के शिकार को चल दिए, चलिए वह भी कम था, पर ”वाशरमेन“
के कहने पर इसी मन के आग्रह से उस सीता को भी छोड़ बैठे।
तब से पूरे हिन्दुस्तान में वाशरमेन कल्चर का आधिपत्य है। मीडिया जानता है, यही हमारी गुलामी है, वह
सुबह शाम सबसे पहले हर कचरा विचार को चीख-चीखकर तर्कापित करता रहता है। हम तुरंत निर्णय
कर लेते हैं, बाद में सिर धुनते हेै।ं
एक ही गाना यहॉं लोकप्रिय रहा है, दोस्त दोत ना रहा।
पर जो प्राण है, वह निरन्तर साथ रहता है। साथ छोड़ता ही नहीं , जब छोड़ता है तब शरीर शव
मात्र रह जाता है। मित्र यही प्राण है।
और एक आप हैं, प्राण के भंडार वायुमंडल को प्रदूषित ही किए जारहे हैं।
पर इस मन को जानने पहचानने तथा उसके नियंत्रण के लिए बहुत कहा जाता रहा है।
जो सदा साथ रहता है, मित्र है, ताकतवर मित्र है, उसके बारे में हम उदासीन हैं।
हम कहते हैं, वह अनायास ही आता है, उसका स्वभाव आना-जाना है।
पर उसके साथ हमारी मित्रता कहाँ है?
‘आत्म’ के घर तक जाने का मार्ग यहीं से है। जहाँ मन मंे कल्पना शक्ति है, वही प्राण में पोषण
शक्ति है। निर्मिति मन नहीं करता ,प्राण करता है। आपके स्वास्थ्य की निशानी यही प्राण है।
आप कितने भी उदास हों, क्रोधित हो, प्राण पर ध्यान सधा, आप शांत होत चले जाएंगे।
जहाँ प्राण से मित्रता है, वहीं तो ‘आत्म’ का प्रसाद उपलब्ध है।
वास्तविक मित्र यही प्राण है, स्वच्छता, पर्यावरण बना रहे, आपका पर्यावरण शुद्ध और पवित्र रहे ,यही
आपका स्वभाव हो, यही वास्तविक मित्रता है।
जन्म से जो साथ आया है, तथा मृत्यु तक जो साथ रहता है, वही तो मित्र है।
मन तो रहता हुआ भी, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ भटकता रहता है, भटकाता है।
इस मन की मित्रता के लिए सभी संत, महात्मा परेशान रहे हैं।
सूरदास जी कह गए,”ऊधो मन नाही दस बीस, जब एक से ही परेशान थे, तब दस
होते क्या होता?
संत कबीर तो गाली तक दे गए , कृष्ण की पूरी गीता इसी कंपायमान चित्त को स्थिर
करने की कला ही है। पर जो सदियों से प्रवचन देते रहे, वही सबसे अधिक अशांत रहे।
बुद्ध, महावीर , नानक , गोरख सभी इसकी मित्रता के लिए उपाय बताते रहे।
राजयोग की पाठशालाएॅं इसी मन की एकाग्रता का पाठ पढ़ा रहीं हैं। पर यह मन है, यह कहीं किसी के
नियंत्रण में आते नहीं देखा।
भगवान रामचंद्रजी जानते हुए भी स्वर्णमृग के शिकार को चल दिए, चलिए वह भी कम था, पर ”वाशरमेन“
के कहने पर इसी मन के आग्रह से उस सीता को भी छोड़ बैठे।
तब से पूरे हिन्दुस्तान में वाशरमेन कल्चर का आधिपत्य है। मीडिया जानता है, यही हमारी गुलामी है, वह
सुबह शाम सबसे पहले हर कचरा विचार को चीख-चीखकर तर्कापित करता रहता है। हम तुरंत निर्णय
कर लेते हैं, बाद में सिर धुनते हेै।ं
एक ही गाना यहॉं लोकप्रिय रहा है, दोस्त दोत ना रहा।
पर जो प्राण है, वह निरन्तर साथ रहता है। साथ छोड़ता ही नहीं , जब छोड़ता है तब शरीर शव
मात्र रह जाता है। मित्र यही प्राण है।
और एक आप हैं, प्राण के भंडार वायुमंडल को प्रदूषित ही किए जारहे हैं।
पर इस मन को जानने पहचानने तथा उसके नियंत्रण के लिए बहुत कहा जाता रहा है।
जो सदा साथ रहता है, मित्र है, ताकतवर मित्र है, उसके बारे में हम उदासीन हैं।
हम कहते हैं, वह अनायास ही आता है, उसका स्वभाव आना-जाना है।
पर उसके साथ हमारी मित्रता कहाँ है?
‘आत्म’ के घर तक जाने का मार्ग यहीं से है। जहाँ मन मंे कल्पना शक्ति है, वही प्राण में पोषण
शक्ति है। निर्मिति मन नहीं करता ,प्राण करता है। आपके स्वास्थ्य की निशानी यही प्राण है।
आप कितने भी उदास हों, क्रोधित हो, प्राण पर ध्यान सधा, आप शांत होत चले जाएंगे।
जहाँ प्राण से मित्रता है, वहीं तो ‘आत्म’ का प्रसाद उपलब्ध है।
वास्तविक मित्र यही प्राण है, स्वच्छता, पर्यावरण बना रहे, आपका पर्यावरण शुद्ध और पवित्र रहे ,यही
आपका स्वभाव हो, यही वास्तविक मित्रता है।